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  1. जिनगी एक टा खेल छी
    सुख दुख केर ई मेल छी

    कहियो जे सुलझि नै सकत
    तेहन ई अगम झेल छी

    संयमतासँ जे नै रहत
    तकरा लेल ई जेल छी

    रूकत नै निरन्तर चलत
    ई अविराम सन रेल छी

    होइत अछि जखन दुख तखन
    दैवक बुझि चलू ठेल छी

    बहरे-मुक्तजिब

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  2. प्रिय चलू संग एकातमे
    डुबि रहब मिठगर बातमे

    अनसहज नै बुझू लग हमर
    आउ बैसू हमर कातमे

    अछि बरसि रहल जे मेघ झुमि
    भीज जायब ग बरिसातमे

    गुन गुना लिअ गजल आइ जुनि
    संग मिलि केर सुर सातमे

    फेर एहन मिलत नै समय
    लिअ मजा प्रेमकेँ मातमे

    बहरे – मुतदारिक

    © कुन्दन कुमार कर्ण

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  3. प्रस्तुत कए रहल छी हम अपन पहिल हजल
    पढू ! हँसू !! हँ, मुदा प्रतिकृया जरुर करब
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    हजल

    एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा
    मारलनि ठुनका कहब हम ककरा

    ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा
    युद्ध चललै कारगिल सन खतरा

    मारि लागल बेलनाकेँ एहन
    फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा

    बाघ छी हम एखनो बाहरमे
    की कहू ? घरमे बनल छी मकरा

    एसगर कुन्दन सकत कोना यौ
    ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा

    मात्राक्रम: 2122-2122-22

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  4. गामक खेत, नदी आ ओ आमक फूलवारी
    खेतक कदवा, गँजार आ कुमरौरी, अदौरीकेँ तरकारी
    मरुवाकेँ रोटी आ मारा माछक चहटगर चटनी
    रौद कोन पानि कोन सभमे गीत गाबि कए खटनी
    फूलवारी महँक मचान, ताहिपर तासक विश्व कपकेँ घमासान
    महन्थ थानपर गप्प सरक्काकेँ लागल ओ साँझ भोरक दोकान
    गाछ, वृक्ष, पोखरि, झाँखरि आइ सभ मोन पडैत अछि
    नै जानी किए शहरमे रहितो नजरि ओहने बात तकैत अछि

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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