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  1. गजल

    Sunday, March 29, 2015

    अहाँ बिनु नै जी सकब हम
    अलग रहि करि की सकब हम

    बिछोड़क ई नोर नैनक
    बहल कोना पी सकब हम

    जरल मोनक वेदना ये
    कते सहि सजनी सकब हम

    मिलत जे प्रेमक सुईया
    हिया फाटल सी सकब हम

    विरहमे नित आब कुन्दन
    बिता नै जिनगी सकब हम

    बहरे-मजरिअ (1222-2122)

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  2. मैथिली सिने संसार पत्रिकाक अगहन/पुष अंकमे प्रकाशित हमर मैथिली गजल विशेष अन्तरवार्ता पर फेसबुक मार्फत प्राप्त किछु महत्वपूर्ण प्रतिकृया :

    Kundan Kumar Karna


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  3. Kundan Kumar Karna
    Holi Ghazal by Kundan Kumar Karna

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  4. खुशीक अनेक रंग सब पर बरसै
    हँसीक इजोर संग जिनगी चमकै

    अबीर गुलाल बीच फगुआ शोभै
    गुलाब समान देह गम-गम गमकै

    उमंग हियासँ नै घटै कहियो धरि
    बसन्त बहार अंगना घर टहलै

    मिलान जुलान केर पावनि थिक ई
    दरेग दयाक चाहमे सब बहकै

    विरान जकाँ रहब हमहुँ नै कुन्दन
    हमर जँ सिनेह लेल केओ तरसै

    मात्राक्रम : 121-121-2122-22

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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