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  1. बाल गजल

    Thursday, May 19, 2016

    फूल पर बैस खेलै छै टिकली
    डारि पर खूब कूदै छै टिकली
    Picture - www.google.com

    भोर आ साँझ नित दिन बारीमे
    गीत गाबैत आबै छै टिकली

    लाल हरिअर अनेको रंगक सभ
    देखमे नीक लागै छै टिकली

    पाँखि फहराक देखू जे उडि-उडि
    दूर हमरासँ भागै छै टिकली

    नाचबै हमहुँ यौ कुन्दन भैया
    आब जेनाक नाचै छै टिकली

    मात्रक्रम : 212-2122-222

    © कुन्दन कुमार कर्ण

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  2. गजल

    Tuesday, May 10, 2016

    जनतन्त्रमे जन राज्यसँ डेरा रहल छै                                    
    अपने चुनल सरकारसँ पेरा रहल छै

    कानूनमे अधिकार मुदा काजमे नै
    स्वतन्त्रता अभ्याससँ हेरा रहल छै

    ठेकान नै कुर्सीक कखन के लऽ जेतै
    सत्ताक भागी जल्दिसँ फेरा रहल छै

    अन्याय अत्याचारसँ पीडित गरीबे
    नेताक चक्रव्यूहसँ घेरा रहल छै

    ककरासँ जनता आब करत कोन उल्हन
    रक्षक सभक बन्दूकसँ रेरा रहल छै

    सेनूर मेटा गेल कतेकोक कुन्दन
    सरकार नै लोकसँ टेरा रहल छै

    2212-221-122-122

    © कुन्दन कुमार कर्ण

    www.kundanghazal.com


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  3. हम नै आलोचक छी । नै समालोचक छी । आ हुनका सभहँक जागिर सेहो छिनऽ नै चाहै छी । तथापि एकटा सर्जककेँ हिसाबसँ मैथिल साहित्यक चर्चित नाऔं सियाराम झा 'सरस' जीक लिखल गजल संग्रहपर संक्षेपमे आइ किछु चर्चा करऽ चाहब ।

    तँ पहिने सरला प्रकाशनद्वारा सन् 1989 मे प्रकाशित कएल गेलह हुनक गजल संग्रह "शोणितायल पैरक निशान"के देखि-

    एहि संग्रहमे कुल ४८टा गजल छै । जकरा आजाद गजलक श्रेणीमे राखि पढल जा सकैछ । किछु गजल भावक दृष्टिकोणे तँ महत्वपूर्ण छहिए किछु शेर सेहो हृदयकेँ छूअवला छै । जेना बतीसम् गजलक ई मतला देखू-

    फूलवन मे एक भँवरा युग युग सँ रहए पियासल
    जनु भोजक खास भडारी रहि जाय निखण्ड उपासल

    पोथीमे 'गजले किएक ?' विषयपर 6 पेज खर्च कए लिखल गेल छै मुदा 'गजले किएक ?' तकर तथ्यपरक तर्क नै भेट सकल ।

    बहरक निर्वहन तँ दूरक बात संग्रहक अधिकांश गजलमे गजलक आधारभुत निअम पालन नै कएल गेल छै । जेना गजल संख्या 2, 3, 8, 11, 14, 15, 18, 21, 23, 24, 25, 26, 27, 30, 35, 36, 45, 46, 47, 48 लगायतके गलजमे काफिया दोष तँ छहिए, बहुत रास गजलमे काफिया आ रदिफक ठेकान नै । ढेर रास शेरकेँ अर्थ सेहो अस्पष्ट बुझाइत । जेना तीसम् गजलक ई मतला देखू-

    भूमि डोलल तँ बहुत किछु डोलल
    भूमि डोलल तँ कहाँ किछू डोलल

    कहब कने नीक नै लागत मुदा गजलक नामपर गजलक मजाक उडाएल जकाँ बुझाएत । तखन एकरा गजल संग्रह कहनाइपर प्रश्नचिन्ह लागि रहल छै । संगे शाइर गजलक विविध पक्षक सम्बन्धमे अनभिज्ञ रहल बात उजागर होइ छै ।

    तेनाहिते नव आरम्भ प्रकाशनद्वरा सन् 2008 मे प्रकाशित हुनके गजल संग्रह 'थोडे आगि थोडे पानि'मे सेहो एहने गल्ती सभ दोहराएल भेटत ।
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  4. गजल

    Monday, May 2, 2016

    बिनु पुछने हृदयसँ ककरो लगाबऽ चलल छलौँ हम
    अनचिन्हार गाममे घर बनाबऽ चलल छलौँ हम

    कारोबार एहि जिनगीक सुखसँ चलाबऽ खातिर
    नेहक लेल मोल अपने घटाबऽ चलल छलौँ हम

    चिन्हब लोककेँ कठिन अछि भरमसँ भरल जगतमे
    बुझि कांटेक फूल हियामे सजाबऽ चलल छलौं हम

    अपनो छाहपर जखन नै भरोस रहल मनुषकेँ
    दोसरकेँ तखन हियामे बसाबऽ चलल छलौं हम

    भगवानक दयासँ कुन्दन कपार हमर सही छल
    अपने घेंचकेँ अनेरो कटाबऽ चलल छलौं हम

    2221-2122-12112-122

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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