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  1. गजल

    Monday, May 2, 2016

    बिनु पुछने हृदयसँ ककरो लगाबऽ चलल छलौँ हम
    अनचिन्हार गाममे घर बनाबऽ चलल छलौँ हम

    कारोबार एहि जिनगीक सुखसँ चलाबऽ खातिर
    नेहक लेल मोल अपने घटाबऽ चलल छलौँ हम

    चिन्हब लोककेँ कठिन अछि भरमसँ भरल जगतमे
    बुझि कांटेक फूल हियामे सजाबऽ चलल छलौं हम

    अपनो छाहपर जखन नै भरोस रहल मनुषकेँ
    दोसरकेँ तखन हियामे बसाबऽ चलल छलौं हम

    भगवानक दयासँ कुन्दन कपार हमर सही छल
    अपने घेंचकेँ अनेरो कटाबऽ चलल छलौं हम

    2221-2122-12112-122

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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