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  1. धधरा नेहक हियामें धधकैत रहि गेलै
    बनि शोणित नोर आँखिसँ टपकैत रहि गेलै

    सपना छल प्रेम करितै केओ अपन जानिक
    सोचिक ई मोन सदिखन बहकैत रहि गेलै

    बेगरता बुझि सकल केओ नै जरल मोनक
    धरकन दिन राति जोरसँ धरकैत रहि गेलै

    ऐबे करतै सजिक मोनक मीत जिनगीमें
    सभ दिन ई आँखि खन–खन फरकैत रहि गेलै

    दाबिक सभ बात मोनक कुन्दन जबरदस्ती
    जगमें बनि फूल तखनो गमकैत रहि गेलै

    मात्राक्रम : 2222-122-221-222

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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