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अगस्त, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ

अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ शोणित केर नोर कना देलक ओ हमरा बिनु रहल कखनो नै कहियो देखू आइ लगसँ भगा देलक ओ सपना जे सजैत रहै जिनगीकेँ सभटा पानिमे कऽ बहा देलक ओ हम बुझलौं गुलाब जँका जकरा नित से हमरे बताह बना देलक ओ भेटल नै इलाज कतौ कुन्दनकेँ एहन पैघ दर्द जगा देलक ओ मात्राक्रम: 2221-21-12222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - देह जखने पुरान बनल यौ

देह जखने पुरान बनल यौ स्थान तखने दलान बनल यौ आङ घटलै उमेर जँ बढलै देश दुनियाँ विरान बनल यौ सोह सुरता रहल कखनो नै आब नाजुक परान बनल यौ अस्त होइत सुरूज जकाँ बुझि राज सेहो अकान बनल यौ रीत छी याह जीवनकेँ सत सोचि कुन्दन हरान बनल यौ मात्राक्रम: 2122-121-122 © कुन्दन कुमार कर्ण