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विशेष

परिपक्व होइत मैथिली गजल: समीक्षा

ई कहब से कोनो अतिशयोक्ति नहिं जे 'मैथिली गजल' किछु साल पूर्व टिकुले रहए आइ बेस कोशा बनि तैयार भ ऽ  रहल छैक फल देबा लेल, तहियो में जँ सहजता पूर्वक मैथिलीक अपन गजलशाश्त्र भेटि जाए अन्चिनहार आखरक रूपमे तखन गजल लेल बेसी मेहनति क ऽ  खगते नहिं रहि जाइत छैक । अन्चिनहार आखरक रूपमे ई एकटा एहेन गजलशाश्त्र भेटल अछि जे मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे समर्थ सिद्ध भ ऽ  रहल अछि। मैथिली गजलक एकटा सुप्र सिद्ध नाम जे भारत सँ ल ऽ  क ऽ  नेपाल धरि अपन गजलसँ श्रोताक माँझ एकटा भिन्न छाप छोड़निहार गजलकार श्री 'कुन्दन कुमार कर्ण' जी केँ किछु गजल- kundangajal.com केर माध्यम सँ आ किछु हुनक फेसबुकक भीतसँ पढ़बाक मौका भेटैत रहैत अछि जे हमरा लेल सौभाग्यक गप्प छै ।  हुनक किछु गजल पर हम अपन विचार राखि रहल छी । 12 मई 2020 क ऽ  एकटा बाल गजल जे शाइरक अपन वेवसाईटपर प्रेशित कएल गेल छन्हिं जे निम्नलिखित अछिः हमर सुन्नर गाम छै  फरल ओत' आम छै  विपतिमे संसार यौ  प्रकृति जेना बाम छै  निकलि बाहर जाउ नै  बिमारी सभ ठाम छै  सफा आ स्वस्थ्य रहब  तखन कोनो काम छै  जनककें सन्तान हम  जनक

गजल (मिथिला आन्दोलन विशेष)

बहराउ यौ मैथिल घरसँ मोनमे ई ठानि कऽ लेबे करब मिथिला राज्य आब छाती तानि कऽ हे वीर मैथिल देखाक वीरता अभिमानसँ आजाद मिथिलाकेँ लेल सब लडू समधानि कऽ हो गाम या शहर छी कतहुँ मुदा सब ठामसँ आबू करू आन्दोलन रहब जँ मिथिला आनि कऽ मेटा रहल अछि पहचान देखिते भूगोलसँ अस्तित्व ई धरतीकेँ बचाउ माए जानि कऽ इतिहास मिथिलाकेँ दैत अछि गवाही कुन्दन ई भूमि छी विद्वानक सदति चलल सब मानि कऽ मात्राक्रम : 2212-2221-2122-211 © कुन्दन कुमार कर्ण

बाल गजल

बाल गजल

फूल पर बैस खेलै छै तितली डारि पर खूब कूदै छै तितली भोर आ साँझ नित दिन बारीमे गीत गाबैत आबै छै तितली लाल हरिअर अनेको रंगक सभ देखमे नीक लागै छै तितली पाँखि फहराक देखू जे उडि-उडि दूर हमरासँ भागै छै तितली नाचबै हमहुँ यौ कुन्दन भैया आब जेनाक नाचै छै तितली मात्रक्रम : 212-2122-222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

दुख केर मारल छी ककरा कहू केहन अभागल छी ककरा कहू हम आन आ अप्पनकेँ बीचमे सगरो उजारल छी ककरा कहू नै जीत सकलहुँ आगू नियतिकेँ जिनगीसँ हारल छी ककरा कहू बनि पैघ किछु नव करऽकेँ चाहमे दुनियाँसँ बारल छी ककरा कहू कुन्दन पुछू संघर्षक बात नै दिन राति जागल छी ककरा कहू मात्राक्रम : 221-222-2212 © कुन्दन कुमार कर्ण

कविता - जवानी

मोन हए छै अहाँकेँ जवानी बैँकमे राखि दी किएक त हम बूढ भ' जेबै तकर हमरा चिन्ता नै मुदा अहाँ जवाने रही से हमर अभिलाषा अछि © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

की जिनगीमे आउ की दूर जाउ बिनु मतलबकेँ राति दिन नै सताउ बोली मिठगर सन अहाँ बाजि फेर हमरा प्रेमक जालमे नै फँसाउ आगूमे देखाक मुस्की अपार पाछूमे सदिखन छुरा नै चलाउ सुच्चा अछि जँ प्रेम साँचे अहाँक सब किछु बुझि हमरे हियामे सजाउ राखू नित कुन्दन जँका शुद्ध मोन बस झूठक कखनो हँसी नै हँसाउ मात्राक्रम : 2222-21-221-21 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

ओकरा देखिते देह अपने सिहरि जाइ छै आगि नेहक हियामे तखन यौ पजरि जाइ छै मारि कनखी दए छै जखन ताकि अनचोकमे डेग अपने हमर ओकरा दिस ससरि जाइ छै ओ हँसै छै त एना बुझाइत रहल बागमे फूल जेना गुलाबक लजाइत झहरि जाइ छै चानकेँ देखिते रातिमे चेहरा ओकरे झिलमिलाइत हमर आँखिमे सजि उतरि जाइ छै लाख लड़की करै छै हमर आब पाछू मुदा छोडि सभकेँ बहकि ओकरेपर नजरि जाइ छै प्रेम कुन्दन हए छै भरम से बुझा जे रहल एहने जालमे मोन सुधि बुधि बिसरि जाइ छै बहरे-मुतदारिक © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

एहि हारल आदमीकेँ हालचाल नै पुछू दर्द सुनिते जाइ बढि तेहन सवाल नै पुछू मारि किस्मत गेल कखनो खेल खेलमे लटा घर घरायल नित बिपतिमे कोन काल नै पुछू संग अपनो नै जरूरतिकेँ समय कतहुँ रहल केलकै कोना कखन के आल टाल नै पुछू बाट जिनगीकेँ रहल जे डेग डेगपर दुखद बीत कोना गेल ई पच्चीस साल नै पुछू के मरै छै एत यौ कुन्दन ककर इयादमे लोक लोकक खीच रहलै आब खाल नै पुछू मात्राक्रम: 2122-2122-2121-212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना

दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना स्वीकारू सभ केओ हमर ई सनेश शुभकामना माए बाबू संगी बहिन भाइ जे कतहुँ रहल अछि चाहे केओ परदेश या दूर देश शुभकामना घरमे लक्ष्मीकेँ आगमन होइ सुखसँ जिनगी सजै प्रेमक सौगातसँ जन समर्पित अशेष शुभकामना वैभवमे नित होइत रहै वृद्धि शान्ति घर-घर रहै मठ मन्दिरमे हम दैत छी दीप लेश शुभकामना पावन अवसरपर आइ कुन्दन हृदयसँ दैत सभकेँ शुभ संध्यामे पूजैत लक्ष्मी गणेश शुभकामना मात्राक्रम: 22222-2122-121-2212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - हमरासँ प्रिय नै रूसल करू

हमरासँ प्रिय नै रूसल करू बेगरता मोनक बूझल करू बनि नेहक सुन्नर सन फूल नित मोनक बगियामे फूलल करू जखने देखै छी हमरा कतहुँ तखने हँसि लगमे रूकल करू जीवन संगी हमरे मानि जुनि आत्मामे बैसा पूजल करू काइल की हेतै मालूम नै एखन कुन्दनमे डूबल करू मात्राक्रम : 2222-22212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - मोन एखनो पारै छी अहीँकेँ

मोन एखनो पारै छी अहीँकेँ बाट एखनो ताकै छी अहीँकेँ भावमे बहकि हम संगी सभक लग बात एखनो बाजै छी अहीँकेँ आब नै रहल कोनो हक अहाँपर जानितो गजल गाबै छी अहीँकेँ दीप जे जरा गेलहुँ नेहकेँ से नित इयादमे बारै छी अहीँकेँ प्रेम भेल नै कहियो बूढ कुन्दन साँस साँसमे चाहै छी अहीँकेँ मात्राक्रम : 212-1222-2122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - हियामे उमंगक अगबे लहर छै

हियामे उमंगक अगबे लहर छै बुझा गेल ई त प्रेमक असर छै धरकि अछि रहल धरकन बड्ड जोरसँ रहल आब किछु नै बाँकी कसर छै मजा एहि जादूकेँ खूब अनुपम सजा मीठ सनकेँ जेना जहर छै गजल पर गजल कहलहुँ ओकरा पर मुदा बादमे बुझलहुँ बेबहर छै पहिल बेर कुन्दन ई बात जानल किए प्रेम सुच्चा जगमे अमर छै मात्राक्रम : 122-122-22-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

अहाँ गोर हम कारी छी मुदा एक टा प्राणी छी सजत रूप नै हमरा बिनु अहाँ देह हम सारी छी रहब नै अलग कखनो जुनि अहाँ ठोर हम लाली छी चलत साँस नै एको छन अहाँ माँछ हम पानी छी कहू आर की यौ कुन्दन अहाँ फूल हम माली छी मात्राक्रम : 1221-2222 © कुन्दन कुमार कर्ण

भक्ति गजल - करै छी अहाँ पर विश्वास हे मैया

करै छी अहाँ पर विश्वास हे मैया कऽ दिअ ने हमर पूरा आश हे मैया चढायब चरणपर अड़हूल नित ललका करब हम अहीँकेँ उपवास हे मैया हरू कष्ट जग जननी पूत बुझि हमरा करू दर्द मोनक सभ नाश हे मैया जियब एहि जगमे ककरा भरोसे हम शरणमे त अप्पन दिअ बास हे मैया रहब भक्तिमे डूबल राति दिन कुन्दन रहत साँसमे जा धरि साँस हे मैया मात्राक्रम : 122-122-221-222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - दर्द मोनक अहाँकेँ कहब हम कोना

दर्द मोनक अहाँकेँ कहब हम कोना चोट नेहक भरल ई सहब हम कोना छोडि हमरा जखन दूर रहबै सजनी भावमे बिनु मिलनकेँ बहब हम कोना संग देबै अहाँ नै जँ सुख आ दुखमे एहि संसारमे यौ रहब हम कोना ठोरपर एसगर नव हँसीकेँ मोती दूर रहि–रहि विरहमे गहब हम कोना सोचि कुन्दन रहल जीविते जिनगी अछि अंचियापर अहाँ बिनु चढ़ब हम कोना मात्राक्रम : 2122-1221-2222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - दुख अपने लग राखै छी

दुख अपने लग राखै छी सुख सभमे हम बाँटै छी सभकेँ बुझि अप्पन सदिखन हँसि-हँसि जिनगी काटै छी पापसँ रहि अलगे बलगे धर्मक गीतल गाबै छी मैथिल छी सज्जन छी हम मिठगर बोली बाजै छी कुन्दन सन गुण अछि हमरा मिथिलाकेँ चमकाबै छी मात्राक्रम : 2222-222 © कुन्दन कुमार कर्ण

कविता - चान (चौरचनकेँ सन्दर्भमे)

आइ असमञ्जसमे छी कोन चान देखू ? उप्परका की निचलका ? उप्परका छुछ्छे हाथ देखब त पाप जँ उप्परका देखब त कहीँ निचलका नै रूसि जाइ

गजल - जिनगी एक वरदान छी

गजल - बादलमे नुका जाइ छैक चान किए

गजल - बीतल दिन जखन मोन पडै छै

गजल - बीतल दिन जखन मोन पडै छै

बीतल दिन जखन मोन पडै छै आँखिसँ बस तखन नोर झरै छै छोडब नै कहै संग अहाँकेँ लग नै आउ से आब कहै छै ओकर देलहा चोटसँ छाती एखन धरि हमर दर्द करै छै जिनगीमे लगा गेल पसाही धधरामे हिया कानि जरै छै के बूझत दुखक बात हियाकेँ कुन्दन आब कोना कँ रहै छै मात्राक्रम : 222-1221-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - हमरा देखिते ओ लजा गेलै

By - Kundan Kumar Karna

बाल गजल - पढबै लिखबै चलबै नीक बाटसँ

पढबै लिखबै चलबै नीक बाटसँ आगू बढबै अपने ठोस आंटसँ संस्कृति अप्पन कहियो छोडब नै अलगे रहबै कूसंगत कऽ लाटसँ फुलिते रहबै सदिखन फूल बनि नित डेरेबै नै कोनो चोख कांटसँ हिम्मत जिनगीमे हेतैक नै कम चलबै आगू बाधा केर टाटसँ बच्चा बुझि मानू कमजोर नै यौ चमकेबै मिथिलाकेँ नाम ठाटसँ मात्राक्रम: 2222-2221-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ

अप्पन हियसँ आइ हटा देलक ओ शोणित केर नोर कना देलक ओ हमरा बिनु रहल कखनो नै कहियो देखू आइ लगसँ भगा देलक ओ सपना जे सजैत रहै जिनगीकेँ सभटा पानिमे कऽ बहा देलक ओ हम बुझलौं गुलाब जँका जकरा नित से हमरे बताह बना देलक ओ भेटल नै इलाज कतौ कुन्दनकेँ एहन पैघ दर्द जगा देलक ओ मात्राक्रम: 2221-21-12222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - देह जखने पुरान बनल यौ

देह जखने पुरान बनल यौ स्थान तखने दलान बनल यौ आङ घटलै उमेर जँ बढलै देश दुनियाँ विरान बनल यौ सोह सुरता रहल कखनो नै आब नाजुक परान बनल यौ अस्त होइत सुरूज जकाँ बुझि राज सेहो अकान बनल यौ रीत छी याह जीवनकेँ सत सोचि कुन्दन हरान बनल यौ मात्राक्रम: 2122-121-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - जिनगी एक टा खेल छी

जिनगी एक टा खेल छी सुख दुख केर ई मेल छी कहियो जे सुलझि नै सकत तेहन ई अगम झेल छी संयमतासँ जे नै रहत तकरा लेल ई जेल छी रूकत नै निरन्तर चलत ई अविराम सन रेल छी होइत अछि जखन दुख तखन दैवक बुझि चलू ठेल छी बहरे-मुक्तजिब © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - प्रिय चलू संग एकातमे

प्रिय चलू संग एकातमे डुबि रहब मिठगर बातमे अनसहज नै बुझू लग हमर आउ बैसू हमर कातमे अछि बरसि रहल जे मेघ झुमि भीज जायब ग बरिसातमे गुन गुना लिअ गजल आइ जुनि संग मिलि केर सुर सातमे फेर एहन मिलत नै समय लिअ मजा प्रेमकेँ मातमे बहरे – मुतदारिक © कुन्दन कुमार कर्ण

हजल - एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा

प्रस्तुत कए रहल छी हम अपन पहिल हजल पढू ! हँसू !! हँ, मुदा प्रतिकृया जरुर करब -------------------------------------------- हजल एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा मारलनि ठुनका कहब हम ककरा ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा युद्ध चललै कारगिल सन खतरा मारि लागल बेलनाकेँ एहन फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा बाघ छी हम एखनो बाहरमे की कहू ? घरमे बनल छी मकरा एसगर कुन्दन सकत कोना यौ ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा मात्राक्रम: 2122-2122-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

कविता - गामक याद

गामक खेत, नदी आ ओ आमक फूलवारी खेतक कदवा, गँजार आ कुमरौरी, अदौरीकेँ तरकारी मरुवाकेँ रोटी आ मारा माछक चहटगर चटनी रौद कोन पानि कोन सभमे गीत गाबि कए खटनी फूलवारी महँक मचान, ताहिपर तासक विश्व कपकेँ घमासान महन्थ थानपर गप्प सरक्काकेँ लागल ओ साँझ भोरक दोकान गाछ, वृक्ष, पोखरि, झाँखरि आइ सभ मोन पडैत अछि नै जानी किए शहरमे रहितो नजरि ओहने बात तकैत अछि © कुन्दन कुमार कर्ण

कता

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कता

निखरल चेहरा गदरल जवानी कोमल देह लागै शुद्ध चानी कोना नै बहकतै देख ई हिय रसगर ठोरपर टघरैत पानी © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - भावनामे बहू नै कखनो

Kundan Kumar Karna - www.facebook.com\kundan.karna

गजल - भावनामे बहू नै कखनो

भावनामे बहू नै कखनो दास मोनक बनू नै कखनो चित्त एकाग्र राखू सदिखन घोर चिन्ता करु नै कखनो मोह माया कऽ बन्धनमे यौ भुलि कऽ मरितो परु नै कखनो मीठ बोली सभक लग बाजू बात कटु सन कहू नै कखनो बाट जे लक्ष्य धरि नै पहुँचत ताहि बाटसँ चलू नै कखनो कर्म आधार छी जिनगीकेँ दूर एहिसँ रहू नै कखनो सूत्र छी किछु सफलताकेँ ई बात व्यर्थक बुझू नै कखनो मात्राक्रम : 2122-12222 © कुन्दन कुमार कर्ण

कता

कविता - जागू जागू सब मैथिल नारी

जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् दोसरकेँ संस्कृति नक्कल नै कऽ, अपनकेँ राखू मान अपनो जागू आ सबकेँ जगाउ, सुतू नै पीबि कऽ लाजक तारी घोघ तरसँ बाहर निकलू, बनू एक होसियार मैथिल नारी बिन बाजने अधिकार नै भेटत, नै भेटत कतो कोनो सम्मान जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् बदरी तरकेँ चानसँ नीक, स्वतन्त्र दीपकेँ ज्योति बनू कतेक दिन रहबै अन्हारमे, बुद्धिकेँ ताला जल्दी खोलू बचाउ सोहर समदाओन, नै हेरा दिओ लोक गीत कतो रहू संस्कार नै छोडू, तखने हएत मिथिलाकेँ हित मैथिली लीखू, मैथिली बाजू, बढाउ मिथिलाकेँ शान जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् रंग बिरंगी अरिपणसँ मिथिलाकेँ ई धरती सजाउ दुनियाँ भरिमे मैथिल नारीकेँ, अदभुत कला देखाउ खाली चुल्हा चौकी केनाइ मात्र नै बुझू अपन काम डेग–डेग पर संघर्ष करु, तखने अमर हएत नाम समय पर नै जागब, त किछु नै एत भेटत असान जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् पवित्र कर्मसँ जानकी बनल अछि नेपालक विभुति जँ हुनके बाटपर चलबै तऽ नै आएत कोनो विपति हुनके जकाँ कर्म कऽ मिथिलामे, चेतना कऽ दीप जराउ चेतनशील भऽ मिथिलामे, शिक्षाकेँ ज्योति फैलाउ मै

गजल - ओ एलै बहार एलै

ओ एलै बहार एलै सुनि मोनक पुकार एलै गेलै मोन भरि उमंगसँ नेहक जे हँकार एलै हुनकर आगमनसँ हियमे प्रीतक रस अपार एलै दुनियाँ नीक लाग लगलै जिनगीकेँ किनार एलै सपना भेल एक पूरा सुखकेँ दिन हजार एलै मात्राक्रम : 2221-2122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - बादलमे नुका जाइ छैक चान किए

बादलमे नुका जाइ छैक चान किए अप्पन एतऽ बनि जाइ छैक आन किए करबै नेह जे केकरो अपार हियसँ तकरो बाद घटि जाइ छैक मान किए राखब बात जे दाबि मोनकेँ कहुना सभकेँ लागिये जाइ छैक भान किए चाहब जे रही खुश सदति हँसैत मुदा ई फुसि केर बनि जाइ छैक शान किए कुन्दन कल्पनामे गजल कहैत चलल सभ बुझि लेलकै प्रीत केर गान किए मात्राक्रम: 2221-2212-12112 ©कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - नेहक झूठ आश नै दिअ

नेहक झूठ आश नै दिअ धरती बिनु अकाश नै दिअ हो अस्तित्व नै हमर जतऽ तेहन ठाम बास नै दिअ अनहारे रहत हमर हिय ई फुसिकेँ प्रकाश नै दिअ हम छी जाहिमे बसल नै से बेकार सांस नै दिअ नै चाही सिनेह एहन जिनगीमे हतास नै दिअ मात्रा क्रम : 2221-2122 (मफऊलात–फाइलातुन) © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - हमरा देखिते ओ लजा गेलै

हमरा देखिते ओ लजा गेलै जादू नेहकेँ ओ चला गेलै भेलै कात नै ई नजरि कनियो चुप्पे चाप नैनसँ बजा गेलै रहितो दूर देहसँ हमर जे ओ छातीमे बुझायल सटा गेलै अनचिन्हार छल ओ मुदा एखन सदिखन लेल अप्पन बना गेलै कुन्दन केर ओ मानिकेँ जिनगी कोमलसन हियामे बसा गेलै मात्रा क्रम : 2221-2212-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

भक्ति गजल - आइ लव यू शिव

आइ लव यू शिव हियसँ बाजू शिव मोन मन्दिरमे सभ सजाबू शिव गीतमे सदिखन मात्र गाबू शिव भक्ति घट घटमे भजि जगाबू शिव एक नारा बस नित लगाबू शिव मात्राक्रम : 2122-2 © कुन्दन कुमार कर्ण