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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

ओकर यादक आइ फेरो.......

हजल

जुग जुग जुराइत रहू  घरमे नुकाइत रहू बेसी अटेरी करब फ्री मे पिटाइत रहू पेटो बलाए बनल भूखल सुखाइत रहू सोफा बिछौना कहै सूतल अघाइत रहू कनियाँ जकर हो मुदा बर लग लजाइत रहू काजे करब आर की चुइगम चिबाइत रहू दुनियां विपतिमे भले पैसा कमाइत रहू 22-122-12 © कुन्दन कुमार कर्ण