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गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

ओकर यादक आइ फेरो.......

हजल

जुग जुग जुराइत रहू  घरमे नुकाइत रहू बेसी अटेरी करब फ्री मे पिटाइत रहू पेटो बलाए बनल भूखल सुखाइत रहू सोफा बिछौना कहै सूतल अघाइत रहू कनियाँ जकर हो मुदा बर लग लजाइत रहू काजे करब आर की चुइगम चिबाइत रहू दुनियां विपतिमे भले पैसा कमाइत रहू 22-122-12 © कुन्दन कुमार कर्ण