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मई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण
बाग नै पूरा बस एक टा गुलाब चाही हो भरल नेहक खिस्सासँ से किताब चाही लोक जिनगी कोना एसगर बिता दए छै एक संगीके हमरा तँ संग आब चाही दर्दमे सेहो मातल हिया रहै निशामे साँझ पडिते बोतलमे भरल शराब चाही मोनमे मारै हिलकोर किछु सवाल नेहक वास्तविक अनुभूतिसँ मोनके जवाब चाही सोचमे ओकर कुन्दन समय जतेक बीतल  आइ छन-छनके हमरा तकर हिसाब चाही 2122-2221-212-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

बाल गजल: गामक बूढ हमर नानी

बाल गजल

गामक बूढ हमर नानी छै ममतासँ भरल खानी पूजा पाठ करै नित दिन दुखिया लेल महादानी खिस्सा खूब सुनाबै ओ राजा कोन रहै रानी भोरे भोर उठा दै छै सुधरै जैसँ हमर बानी नम्हर छोट सभक आगू कहलक बनि क' रहू ज्ञानी 2221-1222 © कुन्दन कुमार कर्ण www.kundanghazal.com