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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल

चलाकक शहरमे चलाकी कऽ विधि जानि लेलौं  गजब भेल चालनिसँ हम पानि जे छानि लेलौं  बहुत दिनसँ खोजैत रहियै अपन शत्रुके हम  अचानक नजरि ऐना पर गेल पहिचानि लेलौं  मिला देत ओ माटिमे हमरा धमकी दऽ गेलै  जनमि गाछ छू लेब हमहूँ गगन ठानि लेलौं  कते साक्ष्य प्रस्तुत करू आर प्रेमक परखमे  अहाँ केर पाथर हिया देवता मानि लेलौं  कलीके खिलल‌ देखि बचपन पड़ल मोन काइल  भसाबैत निर्मालके देखिते आइ हम कानि लेलौं  विरहमे किए मित्र जिनगी बितेबै अनेरो  पहिल छोड़ि गेलै त की दोसरो आनि लेलौं  अलग बात छै ई जे हम होशमे नै छी 'कुन्दन'  भले लड़खड़ाइत अपन ठाम ठेकानि लेलौं  122-122-122-122-122  (बहरे मुतक़ारिब मोअश्शर सालिम)  © कुन्दन कुमार कर्ण