सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जुलाई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

परिपक्व होइत मैथिली गजल: समीक्षा

ई कहब से कोनो अतिशयोक्ति नहिं जे 'मैथिली गजल' किछु साल पूर्व टिकुले रहए आइ बेस कोशा बनि तैयार भ ऽ  रहल छैक फल देबा लेल, तहियो में जँ सहजता पूर्वक मैथिलीक अपन गजलशाश्त्र भेटि जाए अन्चिनहार आखरक रूपमे तखन गजल लेल बेसी मेहनति क ऽ  खगते नहिं रहि जाइत छैक । अन्चिनहार आखरक रूपमे ई एकटा एहेन गजलशाश्त्र भेटल अछि जे मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे समर्थ सिद्ध भ ऽ  रहल अछि। मैथिली गजलक एकटा सुप्र सिद्ध नाम जे भारत सँ ल ऽ  क ऽ  नेपाल धरि अपन गजलसँ श्रोताक माँझ एकटा भिन्न छाप छोड़निहार गजलकार श्री 'कुन्दन कुमार कर्ण' जी केँ किछु गजल- kundangajal.com केर माध्यम सँ आ किछु हुनक फेसबुकक भीतसँ पढ़बाक मौका भेटैत रहैत अछि जे हमरा लेल सौभाग्यक गप्प छै ।  हुनक किछु गजल पर हम अपन विचार राखि रहल छी । 12 मई 2020 क ऽ  एकटा बाल गजल जे शाइरक अपन वेवसाईटपर प्रेशित कएल गेल छन्हिं जे निम्नलिखित अछिः हमर सुन्नर गाम छै  फरल ओत' आम छै  विपतिमे संसार यौ  प्रकृति जेना बाम छै  निकलि बाहर जाउ नै  बिमारी सभ ठाम छै  सफा आ स्वस्थ्य रहब  तखन कोनो काम छै  जनककें सन्तान हम  जनक

गजल

भरल बरिसातमे नै सताउ सजनी किए छी दूर लग आबि जाउ सजनी मिलनके आशमे अंग-अंग तरसै बदन पर वुँद नेहक गिराउ सजनी पिआसल मोन मधुमासमे उचित नै जुआनी ओहिना नै गमाउ सजनी जियब जा धरि करब नेह हम अहीँके हियामे रूप हमरे सजाउ सजनी खुशीमे आइ कुन्दन गजल सुनाबै मजा एहन समयके उठाउ सजनी 122-212-212-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

अपनके अपना हिसाबे बुझू रचलके रचना हिसाबे बुझू असलमे सब किछु रहै छै कहूँ सृजनके सृजना हिसाबे बुझू हिया पर शब्दक असर जे पड़ै गजलके गहना हिसाबे बुझू कहाँ भेटत सोच उठले सभक धसलके धसना हिसाबे बुझू जरनिहारोके कतहुँ नै कमी जरलके जरना हिसाबे बुझू अतीतक नै याद कुन्दन करू घटलके घटना हिसाबे बुझू 122-221-2212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

जे कल्पनामे डुबा दै ओ छथि कवि जे भावनामे बहा दै ओ छथि कवि शब्दक मधुरतासँ करि मति परिवर्तन जे दू हियाके मिला दै ओ छथि कवि साहित्य मानल समाजक अयना छै जे सोचके नव दिशा दै ओ छथि कवि खतरा प्रजातन्त्र पर जौँ-जौँ आबै जे देश जनता जगा दै ओ छथि कवि संसार भरि होइ छै झूठक खेती जे लोकके सत बता दै ओ छथि कवि रचनासँ कुन्दन करै जादू एहन जे चान दिनमे उगा दै ओ छथि कवि 2212-2122-222 © कुन्दन कुमार कर्ण