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गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

रेडियो नेपालक कार्यक्रम 'मधुरिमा'मे मैथिली गजल प्रस्तुति

गजल

अस्तित्वमे अस्तित्व समा जेतै एक दिन अपनाक अपने संग मिला जेतै एक दिन बिनु शब्द आ संगीत मिलनके बेर प्रकृति शुन्ना समयमे गीत सुना जेतै एक दिन नै हम रहब नै देह रहत रहतै बोध टा दुख दर्द सब जिनगीक परा जेतै एक दिन मस्तिष्कके सुख दुखसँ उपर लेबै जे उठा आनन्दमे र्इ मोन डुबा जेतै एक दिन बहिते हृदयमे जोरसँ कुन्दन नेहक हवा चैतन्य केर ज्ञात करा जेतै एक दिन 2212-221-1222-212 © कुन्दन कुमार कर्ण