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जनवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

हिन्दी फिल्मक गीतमे बहर

बहर आ काफिया गजलक अनिवार्य तत्व छै । गीतक रचना लेल एकर अनिवार्यता नै रहै छै । तथापि, ढेर रास हिन्दी फिल्मक (बालिउडक) गीत सभमे एकर निर्वहन सुन्दर तरिकासँ कएल गेल भेटत । उदाहरणस्वरूप देखू ई दू टा गीतकें: 1# फिल्म: शिकारी (2000) शाइर: समीर गायक: कुमार सानु संगीतकार: आदेश श्रीवास्तव मुख्य कलाकारः गोविन्दा, करिशमा कपुर बहर-ए-मुतकारिब मुसम्मन सालिम (122 x 4) बहुत ख़ूबसूरत गज़ल लिख रहा हूँ तुम्हे देखकर आजकल लिख रहा हूँ मिले कब कहाँ, कितने लम्हे गुजारे मैं गिन गिन के वो सारे पल लिख रहा हूँ तुम्हारे जवां ख़ूबसूरत बदन को तराशा हुआ इक महल लिख रहा हूँ न पूछों मेरी बेकरारी का आलम मैं रातों को करवट बदल लिख रहा हूँ तक्तीअः बहुत ख़ू / बसूरत / गज़ल लिख / रहा हूँ 122 / 122 / 122 / 122 तुम्हे दे / खकर आ / जकल लिख / रहा हूँ 122 / 122 / 122 / 122 मिले कब / कहाँ कित / ने लम्हे / गुजारे 122 / 122 / 122 / 122 मैं गिन गिन / के वो सा / रे पल लिख / रहा हूँ 122 / 122 / 122 / 122 तुम्हारे / जवां ख़ू / बसूरत / बदन को 122 / 122 / 122 / 122 तराशा / हुआ इक / महल लिख / रहा हूँ 122 / 122 / 122 / 122 न पूछों / मेरी बे

अशआर

जदी छौमो न भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या Kundan Kumar Karna

गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण