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नवंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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कविता : पराती

रंग विरंगक भास छलै गीत गबैत परात रहै भोर कहै शुभभोर सदा बड्ड मजा छल बड्ड मजा आब दलानक शान कहाँ बूढ़ पुरानक गान‌ वला इन्टरनेटक शासनमे संस्कृति खातिर सोचत के छन्द : सारवती (ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ) Kundan Kumar Karna

गजल - धधरा नेहक हियामें धधकैत रहि गेलै

धधरा नेहक हियामें धधकैत रहि गेलै बनि शोणित नोर आँखिसँ टपकैत रहि गेलै सपना छल प्रेम करितै केओ अपन जानिक सोचिक ई मोन सदिखन बहकैत रहि गेलै बेगरता बुझि सकल केओ नै जरल मोनक धरकन दिन राति जोरसँ धरकैत रहि गेलै ऐबे करतै सजिक मोनक मीत जिनगीमें सभ दिन ई आँखि खन–खन फरकैत रहि गेलै दाबिक सभ बात मोनक कुन्दन जबरदस्ती जगमें बनि फूल तखनो गमकैत रहि गेलै मात्राक्रम : 2222-122-221-222 © कुन्दन कुमार कर्ण