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नवंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण मैथिली गजल

गजल - धधरा नेहक हियामें धधकैत रहि गेलै

धधरा नेहक हियामें धधकैत रहि गेलै बनि शोणित नोर आँखिसँ टपकैत रहि गेलै सपना छल प्रेम करितै केओ अपन जानिक सोचिक ई मोन सदिखन बहकैत रहि गेलै बेगरता बुझि सकल केओ नै जरल मोनक धरकन दिन राति जोरसँ धरकैत रहि गेलै ऐबे करतै सजिक मोनक मीत जिनगीमें सभ दिन ई आँखि खन–खन फरकैत रहि गेलै दाबिक सभ बात मोनक कुन्दन जबरदस्ती जगमें बनि फूल तखनो गमकैत रहि गेलै मात्राक्रम : 2222-122-221-222 © कुन्दन कुमार कर्ण