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गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण मैथिली गजल

हजल

जकरा बुते उठल नै खर कहत बनेलौं नवका घर एक दिन बर जोतलनि हर हगलनि‌ पदलनि लगलनि जर घिनमाघिन चललै सबतरि हम छियै उपर तूँ छी तर मौगी खातिर रूसल छौड़ा नोकरी चाकरी ठां नै ठर साँच किए बजलियै अहाँ मनुष छियै की मनुषक झर 22-22-22-2 © कुन्दन कुमार कर्ण

नेपाली गजल

उनको नजरमा म पागल जस्तै छु वर्षा बिनाको म बादल जस्तै छु  बुझ्छिन् कुनै दिन उनी मेरो मूल्य बज्ने गजलमा म मादल जस्तै छु  सजिलै कहाँ टिप्न मेरो मुटु नै छ वनमा फलेको म काफल जस्तै छु  बोलाउ छन् कुन बखत के ठेगान भगवानका लागि भाकल जस्तै छु  कस्तो अनौठो छ कुन्दन यो प्रेम चोटै नखाई म घायल जस्तै छु  2212-2122-221 © कुन्दन कुमार कर्ण

नचारी (शिव‌ भजन/ भक्ति गीत)

समुच्चा नगरमे मचल छै शोर भोलाकें बसहा लऽ गेलै चोर शुभम नै जानल स्कंद नै बूझल गौरी चकित भेलनि भोरे भोर भोलाकें बसहा................... ॠषि मुनि देवता चलल खोजीमे ककरो नै भेटल टूटलो डोर भोलाकें बसहा................... भागि चोर लगसँ कैलाश एलै बसहाकें भक्ति सेहो बेजोड़ भोलाकें बसहा................... समुच्चा नगरमे मचल छै शोर कैलाश पर बरलै फेर इजोर गीत‌ बाजै छै जेना मटिकोर बसहा संग नाचै चिरै चकोर 222222222 © कुन्दन कुमार कर्ण

नचारी (शिव‌ भजन/ भक्ति गीत)

हाथ डमरू कान कुण्डल शीर्ष शोभै चान हे बैसि पर्वत पर धरै एकान्तमे शिव ध्यान हे रुद्र माला बांहि पहिरल बाघ छाला जांघमे साँप धारण कण्ठ केने देह मातल भांगमे पाप नाशक धर्म रक्षक जग करै कल्याण हे हाथ डमरू कान कुण्डल................... नैन खुजिते फूल बरसै ठोर बजिते प्रेम यौ इन्द्र नारद भक्त बनि पूरा करै सब नेम यौ शुद्ध रहिते भाव सहजे देत सब वरदान हे हाथ डमरू कान कुण्डल................... हाथ डमरू कान कुण्डल शीर्ष शोभै चान हे बैसि पर्वत पर धरै एकान्तमे शिव ध्यान हे 2122-2122-2122-212 (बहरे रमल मुसम्मन महजूफ) © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

लगा आगि ओ पानि ढारै अपने अछैते बसल घर उजारै अपने तमासा कहब की बुझू अज्ञानी उडा धान खखरीक लारै अपने रहल ठोर चुप्पे मुदा नैना सब दबल बात मोनक उघारै अपने प्रतीक्षा जबाबक अधूरे रहलै लिखै पत्र आओर फारै अपने किए लोक लोकेसँ नै डेरेतै अपन लोककें जे बजारै अपने मिलै लेल तैयार छी हम कुन्दन समय देत ओ फेर टारै अपने 122-122-122-22 (बहरे मुतकारिब मुसम्मन अस्लम) © कुन्दन कुमार कर्ण

कुन रचना गजल हो, कुन होइन ?

इन्टरनेट तथा सामाजिक सञ्जालले गर्दा सर्जकहरुलाई   आफ्ना सृजना पाठकहरु समक्ष पुर्याउन अत्यन्त सहज र सरल भएको छ । विद्युतीय पुस्तक तथा ब्लागहरु पढ्ने चलन बढ्दो क्रममा छ । सर्जकहरुले आफ्ना रचनाहरुको सम्बन्धमा पाठकहरुको प्रशंसा र प्रतिकृया सामाजिक सञ्जाल मार्फत द्रुतगतिमा पाउने हुनाले सामाजिक सञ्जालहरुमा व्यापक रुपमा साहित्यिक गतिविधि भै रहेको देख्न सकिन्छ । साहित्यका विभिन्न विधाहरुका नामबाट सयौं समूह तथा पेजहरु निर्माण भएका छन् ।   यहीं सहजता र सरलताले गर्दा सर्जकहरुको संख्या समेत दिनानुदिन बढ्दै गइरहेको छ । ब्लाग तथा सामाजिक सञ्जालहरुमा कविता ,  कथा ,  लघु कथा ,  गजल ,  हाइकु ,  दोहा ,  गीत आदी लगायत विधाका रचनाहरु निरन्तर साझा भै राखेका हुन्छन् । साहित्यिक गतिविधि तथा रचनाकारहरुको संख्यामा वृद्धि हुनु साहित्यका लागि सकारात्मक कुरा भएतापनि अध्धययन , अभ्यास र शिल्पको अभावमा कुनैपनि विधाको नियम नै नजानी जथाभावी गरिने रचनाले साहित्यमा विकृति र पाठकमा भ्रम सृजना नहोस् भनेर त्यतिकै सचेत हुनुपर्ने अवस्था देखिन्छ । जापानीज साहित्यबाट आएको हाइकु होस् वा अरबी साहित्यबाट आएको गजल किन