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गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण मैथिली गजल

गजल

देश भरि कहादन रेल चलतै आब फेर किछु विकासक खेल चलतै आब थालमे धमाधम पीच करतै बाट टोल-टोल हेलम हेल चलतै आब कामकाज हेतै सारहे बाईस योजनाक खातिर झेल चलतै आब बुद्धिमान सब बेहोश जेना भेल राजकाजमे बकलेल चलतै आब नागरिकसँ उप्पर छै बनल सरकार लोकतन्त्र ककरा लेल चलतै आब राजनीतिमे कुन्दन बढल अपराध जन जनारदनके जेल चलतै आब 212-122-212-221 © कुन्दन कुमार कर्ण