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जनवरी, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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परिपक्व होइत मैथिली गजल: समीक्षा

ई कहब से कोनो अतिशयोक्ति नहिं जे 'मैथिली गजल' किछु साल पूर्व टिकुले रहए आइ बेस कोशा बनि तैयार भ ऽ  रहल छैक फल देबा लेल, तहियो में जँ सहजता पूर्वक मैथिलीक अपन गजलशाश्त्र भेटि जाए अन्चिनहार आखरक रूपमे तखन गजल लेल बेसी मेहनति क ऽ  खगते नहिं रहि जाइत छैक । अन्चिनहार आखरक रूपमे ई एकटा एहेन गजलशाश्त्र भेटल अछि जे मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे समर्थ सिद्ध भ ऽ  रहल अछि। मैथिली गजलक एकटा सुप्र सिद्ध नाम जे भारत सँ ल ऽ  क ऽ  नेपाल धरि अपन गजलसँ श्रोताक माँझ एकटा भिन्न छाप छोड़निहार गजलकार श्री 'कुन्दन कुमार कर्ण' जी केँ किछु गजल- kundangajal.com केर माध्यम सँ आ किछु हुनक फेसबुकक भीतसँ पढ़बाक मौका भेटैत रहैत अछि जे हमरा लेल सौभाग्यक गप्प छै ।  हुनक किछु गजल पर हम अपन विचार राखि रहल छी । 12 मई 2020 क ऽ  एकटा बाल गजल जे शाइरक अपन वेवसाईटपर प्रेशित कएल गेल छन्हिं जे निम्नलिखित अछिः हमर सुन्नर गाम छै  फरल ओत' आम छै  विपतिमे संसार यौ  प्रकृति जेना बाम छै  निकलि बाहर जाउ नै  बिमारी सभ ठाम छै  सफा आ स्वस्थ्य रहब  तखन कोनो काम छै  जनककें सन्तान हम  जनक

गजल

आब सहब नै दाबन ककरो जोर जुलुम आ चापन ककरो गेल जमाना क्रूरक सभकेँ घर त हमर छल आसन ककरो भेल बहुत जे भेलै काइल लोक सुनै बस भाषण ककरो पूत मधेसक छी अभिमानी सहि कऽ रहब नै शोषण ककरो दर्द विभेदक भारी कुन्दन माथ हमर अछि चानन ककरो मात्राक्रम : 2112-222-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

भक्ति गजल (सरस्वती वन्दना)

Saraswati Pooja

भक्ति गजल (सरस्वती वन्दना)

हे शारदे दिअ एहन वरदान हो जैसँ जिनगी हमरो कल्याण पूजब सदति हे माए बनि पूत अपना शरणमे दिअ हमरा स्थान निष्काम हो मोनक सभ टा आश सुख शान्ति आ जगमे दिअ सम्मान जिनगी समाजक लागै शोकाज हमरा बना दिअ तेहन गुणवान लिअ प्रार्थना कुन्दनकेँ स्वीकारि बल वुद्धि विद्या आ दिअ ने ज्ञान मात्राक्रम : 2212-222-221 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

तोरा आदर कि केलियौ तूँ त हमरा सस्ता बुझि लेलही बस अपनाकेँ गुलाब हमरा सुखल सन पत्ता बुझि लेलही मोनक कुर्सी कि देलियौ बैस तोरा एके छन लेल हम हमरे जिनगीक तूँ अपन राजनीतिक सत्ता बुझि लेलही गजलक गंभीरता मधुरता असलमे तोरा की मालूम हमरा शाइर त बात दूरक अपन तूँ भगता बुझि लेलही शारीरिक हाउ भाउ तोहर बुझाइत रहलहुँ एना सदति जेना नेहक रहै पहिल बेर हमरे खगता बुझि लेलही नै छै जै मोनमे रहल चाह नेहक कोनो कुन्दन हमर तै मोनसँ हम किएक जोडब अधूरा नाता बुझि लेलही मात्राक्रम : 22221-212-2122-222-212 © कुन्दन कुमार कर्ण

हम

Kundan Kumar Karna

गजल

साँचमे शायद ओ नै चाहैत रहै मोन झुठ्ठे सदिखन पतिआबैत रहै फुलि हमर आगू ओ सुन्नर फूल जकाँ बाग पाछू अनकर गमकाबैत रहै हम हियामे बैसेलहुँ बुझि नेह अपन तेँ सदति हमरा ओ तड़पाबैत रहै साँच नेहक दुनियामे अछि मोल कहाँ लोक जैमे जिनगी बीताबैत रहै जाइ छल मन्दिर नित कुन्दन संग मुदा प्राथनामे दोसरकेँ माँगैत रहै मात्राक्रम : 212-222-2221-12 © कुन्दन कुमार कर्ण