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गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

अपना हारिओक दोसरके जीत जाइ छै संयम राखि सबसँ जे जोडि प्रीत जाइ छै मिठगरके पचा लए छै केओ मनुष मुदा साधक ओ कहाइ छथि जे पी तीत जाइ छै साक्षी भावमे विचारक कोनो बिया कहाँ सदिखन मोन गुनगुना प्रेमक गीत जाइ छै उपजल चेतनाक जखने विद्रोह लोकमे संसारक पुरान सब टा टुटि रीत जाइ छै सम्बन्धक कतारमे कुन्दन भीड हो बहुत बेगरताक छन पुकारल बस मीत जाइ छै 2221-2122-221-212 © कुन्दन कुमार कर्ण