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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल

की कहू मोनमे किछु फूराइत नै अछि आइ काइल ओकरा छोड़ि केओ सोहाइत नै अछि आइ काइल मोहिनी रूप ओकर केलक नैना पर कोन जादू चेहरा आब दोसर देखाइत नै अछि आइ काइल नेह जहियासँ भेलै हेरा रहलै सुधि बुधि दिनोदिन बात दुनियाक कोनो सोचाइत नै अछि आइ काइल शब्द जे छल हमर लग पातीमे लिखि सब खर्च केलौं  भाव मोनक गजलमे बहराइत नै अछि आइ काइल संग जिनगीक कुन्दन चाही ओकर सातो जनम धरि निन्नमे आँखि आरो सपनाइत नै अछि आइ काइल 2122-1222-2222-2122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

ओकर संग ई जिनगीक असान बना देलक सुख दुखमे हृदयके एक समान बना देलक बुढ़हा गेल छल यौ बुद्धि विचार निराशामे ज्ञानक रस पिआ ओ फेर जुआन बना देलक अध्यात्मिक जगतके बोध कराक सरलतासँ हमरा सन अभागल केर महान बना देलक चाहक ओझरीमे मोन हजार दिशा भटकल अध्ययनेसँ तृष्णा मुक्त परान बना देलक अष्टावक्र गीता लेल विशेष गजल कुन्दन कहितेमे हमर मजगूत इमान बना देलक 2221-2221-121-1222 (तेसर शेरक पहिल मिसराक अन्तिम  लघुके दीर्घ मानबाक छूट लेल गेल अछि) © कुन्दन कुमार कर्ण