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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल

दोसरकें बात पर नै उछल एको डेग अपनासँ तूँ चल अपने वुद्धि काज देतौ‌ रे चाहे छी मूर्ख चाहे पढ़ल लोहा सेहो लीबि जाइ छै बोली जे रहतौ मीठ सरल संघर्षे कऽ नाम छै जिनगी घर बैसि भेटलै ककरा फल  शमशान रहल हेतै कहियो जै ठां देखै छी आइ महल ओकर चुप्पी बुझाइ नाटक ओ जे बाजै त लागै गजल दुनियासँ भागब किए कुन्दन दलदलमे रहि खिलै छै कमल बहरे मीर © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

केओ हाल जँ पुछतै कहि देब गोपीचन गुदरिया जकाँ गामे गाम फिरै छै गाबैत सोहर ओ पमरिया जकाँ जल थल अग्नि पवन चाहे हो गगन छै प्राण सभमें‌ जखन फेरो देह पुरनका ने हम किए बदलब चदरिया जकाँ अन्चिहार‌ रहौ या चिन्हार रहलौं संग दुखमे सदति स्वार्थी सोच हमर नै छै एखनो कोनो शहरिया जकाँ आर्थिक वृद्धि गजब देखल ऐतिहासिक एहि सरकारमे नमरी ऐंठ गरीबक आगू चलै मातल हजरिया जकाँ सत्तामेसँ निकल मुठ्ठी भरि उठा ले माटि आ सत बता पुरखा एहि वतनमे पाछू ककर बसलै बहरिया जकाँ 'कुन्दन' जीबि रहल छी हम ओकरा बिनु कोन विधि की कहू कोशी बागमतीके मारल समस्तीपुर खगड़िया जकाँ 2221-1222-2122-2122-12 © कुन्दन कुमार कर्ण