सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

सितंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

दोसरकें बात पर नै उछल एको डेग अपनासँ तूँ चल अपने वुद्धि काज देतौ‌ रे चाहे छी मूर्ख चाहे पढ़ल लोहा सेहो लीबि जाइ छै बोली जे रहतौ मीठ सरल संघर्षे कऽ नाम छै जिनगी घर बैसि भेटलै ककरा फल  शमशान रहल हेतै कहियो जै ठां देखै छी आइ महल ओकर चुप्पी बुझाइ नाटक ओ जे बाजै त लागै गजल दुनियासँ भागब किए कुन्दन दलदलमे रहि खिलै छै कमल बहरे मीर © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

केओ हाल जँ पुछतै कहि देब गोपीचन गुदरिया जकाँ गामे गाम फिरै छै गाबैत सोहर ओ पमरिया जकाँ जल थल अग्नि पवन चाहे हो गगन छै प्राण सभमें‌ जखन फेरो देह पुरनका ने हम किए बदलब चदरिया जकाँ अन्चिहार‌ रहौ या चिन्हार रहलौं संग दुखमे सदति स्वार्थी सोच हमर नै छै एखनो कोनो शहरिया जकाँ आर्थिक वृद्धि गजब देखल ऐतिहासिक एहि सरकारमे नमरी ऐंठ गरीबक आगू चलै मातल हजरिया जकाँ सत्तामेसँ निकल मुठ्ठी भरि उठा ले माटि आ सत बता पुरखा एहि वतनमे पाछू ककर बसलै बहरिया जकाँ 'कुन्दन' जीबि रहल छी हम ओकरा बिनु कोन विधि की कहू कोशी बागमतीके मारल समस्तीपुर खगड़िया जकाँ 2221-1222-2122-2122-12 © कुन्दन कुमार कर्ण