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मार्च, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

अहाँ बिनु नै जी सकब हम अलग रहि करि की सकब हम बिछोड़क ई नोर नैनक बहल कोना पी सकब हम जरल मोनक वेदना ये कते सहि सजनी सकब हम मिलत जे प्रेमक सुईया हिया फाटल सी सकब हम विरहमे नित आब कुन्दन बिता नै जिनगी सकब हम बहरे-मजरिअ (1222-2122) © कुन्दन कुमार कर्ण

तस्वीर - हम धीरेन्द्र प्रेमर्षि जीक संग

Kundan Kumar Karna with Dhirendra Premarshi

फेसबुक अवगत - मैथिली सिने संसारमे प्रकाशित अन्तर्वार्ता पर आएल फेसबुक प्रतिकृया

मैथिली सिने संसार पत्रिकाक अगहन/पुष अंकमे प्रकाशित हमर मैथिली गजल विशेष अन्तरवार्ता पर फेसबुक मार्फत प्राप्त किछु महत्वपूर्ण प्रतिकृया :

गजल (होरी/होली विशेष)

Holi Ghazal by Kundan Kumar Karna

गजल (होरी/होली विशेष)

खुशीक अनेक रंग सब पर बरसै हँसीक इजोर संग जिनगी चमकै अबीर गुलाल बीच फगुआ शोभै गुलाब समान देह गम-गम गमकै उमंग हियासँ नै घटै कहियो धरि बसन्त बहार अंगना घर टहलै मिलान जुलान केर पावनि थिक ई दरेग दयाक चाहमे सब बहकै विरान जकाँ रहब हमहुँ नै कुन्दन हमर जँ सिनेह लेल केओ तरसै मात्राक्रम : 121-121-2122-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

हम

Kundan Kumar Karna