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कविता : पराती

रंग विरंगक भास छलै गीत गबैत परात रहै भोर कहै शुभभोर सदा बड्ड मजा छल बड्ड मजा आब दलानक शान कहाँ बूढ़ पुरानक गान‌ वला इन्टरनेटक शासनमे संस्कृति खातिर सोचत के छन्द : सारवती (ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ) Kundan Kumar Karna

गजल

दर्दके सेहो ई दर्द दर्दनाक बुझाइ छै लोक छै किछु जकरा लेल सब मजाक बुझाइ छै एक छनमे बन्हन तोड़ि गेल बात बनाक ओ आब नाता हमरो सूतरीक टाक बुझाइ छै सोझके दुनियामे के पुछै समाज जहर बनल नैन्ह टा बच्चा आ बूढ़ सब चलाक बुझाइ छै धुंइया जोरक उठलै पड़ोसियाक दलानमे रचयिता एहन षड्यंत्र केर पाक बुझाइ छै मोंछ पर तेजी ओकीलबा घुमाक दएत छै कचहरीके मुद्दामे बढल तलाक बुझाइ छै 2122-2221-2121-1212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

जुआनीके पहिल उत्सव मनेलौं हम हियामे ओकरा जहिया बसेलौं हम सुरुआते गजब छल सोलहम बरिसक अचानक डेग यौवन दिस बढेलौं हम उचंगाके कमी नै टोलमे कोनो नजरि मिलिते इशारामे बजेलौं हम गवाही चान तारा छै पहिल मिलनक कलीके संग भमरा बनि फुलेलौं हम असानी छै कहाँ टिकनाइ नेही बनि समाजक रीतमे शोणित बहेलौं हम कलम कापी किताबक कोन बेगरता जखन इतिहासमे प्रेमी लिखेलौं हम चिरै सन मोन ई उड़िते रहल कुन्दन असम्भवपर किए असरा लगेलौं हम बहरे-हजज (1222×3) © कुन्दन कुमार कर्ण