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गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

मैथिली गजल

गजल

साँच बजलासँ मारल गेलियै  देश दुनियाँसँ बारल गेलियै  स्वार्थ जेना सफल भेलै जकर  तकरा लग तेना धारल गेलियै  ओकरा जीतकें छल लोलसा  ओकरे लेल हारल‌ गेलियै  फूल फल आ हवा देलौं मुदा  जड़िसँ हमहीं उखारल गेलियै  नग्नकें बीच 'कुन्दन' वस्त्रमे  दोषी देखा उघारल गेलियै  2122-122-212  © कुन्दन कुमार कर्ण