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गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

अन्तरवार्ता - मेट्रो एफ.एम. 94.6 मेगाहर्ज पर

दिनांक 28.05.2015 : काठमाण्डू महानगर पालिका द्वारा संचालित आ राष्ट्रिय सभागृहसँ प्रसारणरत मेट्रो एफ.एम. 94.6 मेगाहर्ज पर कार्यक्रम मिथिलाञ्चलमे कार्यक्रम संचालक सरोज खिलाडी द्वारा कएल गेल मैथिली गजल आ साहित्य सम्बन्धि प्रत्यक्ष साक्षात्कार कालमे लेल गेल र्इ तस्वीर ।

गजल (भू-कम्पक सन्दर्भमे)

घर छोडि डरमे जी रहल छी एहन शहरमे जी रहल छी दिन राति छी काटैत एना जेना कहरमे जी रहल छी संसार अपनेमे मगन छै  भगवान भरमे जी रहल छी प्रकृतिसँ हारल अछि परिस्थिति कालक असरमे जी रहल छी मजबूर छी जिनगीसँ कुन्दन तँइ एसगरमे जी रहल छी मात्राक्रम : 221-222-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल (भू–कम्पक सन्दर्भमे)

सम्पूर्ण भूकम्प पीड़ित आ एहि कारणे अपना सभक बीचसँ गुजरलप्रति श्रद्धाञ्लीस्वरूप समर्पित ई गजल जै ठाँ छल काइल नित जिनगीक मुस्कान तै ठाँ बस नोरक रहि गेलै किए स्थान हे ईश्वर ई केहन खेल प्रकृति केर लोकक घर जेना अछि बनि गेल शमसान गजलक अक्षर-अक्षर कानैत अछि आब कहि धरती कोना यौ बनि गेल बइमान कहियो सुन्नरता जै देशक रहल शान छन भरिमे सभ ओ मेटा गेल पहचान आशा मोनक कुन्दन अछि जीविते मोर उगबे करतै जिनगीमे एक दिन चान मात्राक्रम : 222-222-221-221 © कुन्दन कुमार कर्ण