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नवंबर, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

गजलः जमीन पर जनता हवामे सरकार

जमीन पर जनता हवामे सरकार कहू चलत कोना गरिबक घरबार समाजवादक नारा लगबै बेजोड़ सवा करोड़क जे चढ़ै मोटरकार समाजमे निर्दोष जेतै ककरा लग कमल कऽ उप्पर भारी भेलै तलवार अमल करब सेहो जरुरी छै श्रीमान् विधान टा भेने मिलल की अधिकार जमाना एलै आब पूरा डिजिटलकें पढ़ै कहाँ छै लोक सब अखबार उठू चलू आगू बढू देशक लेल विकास खातिर लेत क्यो नै अवतार नदी कखन हम पार हेबै यौ कुन्दन चलैत नाहक टूटि गेलै पतवार © कुन्दन कुमार कर्ण

कविता - जवानी

मोन हए छै अहाँकेँ जवानी बैँकमे राखि दी किएक त हम बूढ भ' जेबै तकर हमरा चिन्ता नै मुदा अहाँ जवाने रही से हमर अभिलाषा अछि © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

की जिनगीमे आउ की दूर जाउ बिनु मतलबकेँ राति दिन नै सताउ बोली मिठगर सन अहाँ बाजि फेर हमरा प्रेमक जालमे नै फँसाउ आगूमे देखाक मुस्की अपार पाछूमे सदिखन छुरा नै चलाउ सुच्चा अछि जँ प्रेम साँचे अहाँक सब किछु बुझि हमरे हियामे सजाउ राखू नित कुन्दन जँका शुद्ध मोन बस झूठक कखनो हँसी नै हँसाउ मात्राक्रम : 2222-21-221-21 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

ओकरा देखिते देह अपने सिहरि जाइ छै आगि नेहक हियामे तखन यौ पजरि जाइ छै मारि कनखी दए छै जखन ताकि अनचोकमे डेग अपने हमर ओकरा दिस ससरि जाइ छै ओ हँसै छै त एना बुझाइत रहल बागमे फूल जेना गुलाबक लजाइत झहरि जाइ छै चानकेँ देखिते रातिमे चेहरा ओकरे झिलमिलाइत हमर आँखिमे सजि उतरि जाइ छै लाख लड़की करै छै हमर आब पाछू मुदा छोडि सभकेँ बहकि ओकरेपर नजरि जाइ छै प्रेम कुन्दन हए छै भरम से बुझा जे रहल एहने जालमे मोन सुधि बुधि बिसरि जाइ छै बहरे-मुतदारिक © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

एहि हारल आदमीकेँ हालचाल नै पुछू दर्द सुनिते जाइ बढि तेहन सवाल नै पुछू मारि किस्मत गेल कखनो खेल खेलमे लटा घर घरायल नित बिपतिमे कोन काल नै पुछू संग अपनो नै जरूरतिकेँ समय कतहुँ रहल केलकै कोना कखन के आल टाल नै पुछू बाट जिनगीकेँ रहल जे डेग डेगपर दुखद बीत कोना गेल ई पच्चीस साल नै पुछू के मरै छै एत यौ कुन्दन ककर इयादमे लोक लोकक खीच रहलै आब खाल नै पुछू मात्राक्रम: 2122-2122-2121-212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना

दीयावातीकेँ हम दए छी विशेष शुभकामना स्वीकारू सभ केओ हमर ई सनेश शुभकामना माए बाबू संगी बहिन भाइ जे कतहुँ रहल अछि चाहे केओ परदेश या दूर देश शुभकामना घरमे लक्ष्मीकेँ आगमन होइ सुखसँ जिनगी सजै प्रेमक सौगातसँ जन समर्पित अशेष शुभकामना वैभवमे नित होइत रहै वृद्धि शान्ति घर-घर रहै मठ मन्दिरमे हम दैत छी दीप लेश शुभकामना पावन अवसरपर आइ कुन्दन हृदयसँ दैत सभकेँ शुभ संध्यामे पूजैत लक्ष्मी गणेश शुभकामना मात्राक्रम: 22222-2122-121-2212 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - हमरासँ प्रिय नै रूसल करू

हमरासँ प्रिय नै रूसल करू बेगरता मोनक बूझल करू बनि नेहक सुन्नर सन फूल नित मोनक बगियामे फूलल करू जखने देखै छी हमरा कतहुँ तखने हँसि लगमे रूकल करू जीवन संगी हमरे मानि जुनि आत्मामे बैसा पूजल करू काइल की हेतै मालूम नै एखन कुन्दनमे डूबल करू मात्राक्रम : 2222-22212 © कुन्दन कुमार कर्ण