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जुलाई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल - जिनगी एक टा खेल छी

जिनगी एक टा खेल छी सुख दुख केर ई मेल छी कहियो जे सुलझि नै सकत तेहन ई अगम झेल छी संयमतासँ जे नै रहत तकरा लेल ई जेल छी रूकत नै निरन्तर चलत ई अविराम सन रेल छी होइत अछि जखन दुख तखन दैवक बुझि चलू ठेल छी बहरे-मुक्तजिब © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - प्रिय चलू संग एकातमे

प्रिय चलू संग एकातमे डुबि रहब मिठगर बातमे अनसहज नै बुझू लग हमर आउ बैसू हमर कातमे अछि बरसि रहल जे मेघ झुमि भीज जायब ग बरिसातमे गुन गुना लिअ गजल आइ जुनि संग मिलि केर सुर सातमे फेर एहन मिलत नै समय लिअ मजा प्रेमकेँ मातमे बहरे – मुतदारिक © कुन्दन कुमार कर्ण

हजल - एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा

प्रस्तुत कए रहल छी हम अपन पहिल हजल पढू ! हँसू !! हँ, मुदा प्रतिकृया जरुर करब -------------------------------------------- हजल एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा मारलनि ठुनका कहब हम ककरा ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा युद्ध चललै कारगिल सन खतरा मारि लागल बेलनाकेँ एहन फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा बाघ छी हम एखनो बाहरमे की कहू ? घरमे बनल छी मकरा एसगर कुन्दन सकत कोना यौ ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा मात्राक्रम: 2122-2122-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

कविता - गामक याद

गामक खेत, नदी आ ओ आमक फूलवारी खेतक कदवा, गँजार आ कुमरौरी, अदौरीकेँ तरकारी मरुवाकेँ रोटी आ मारा माछक चहटगर चटनी रौद कोन पानि कोन सभमे गीत गाबि कए खटनी फूलवारी महँक मचान, ताहिपर तासक विश्व कपकेँ घमासान महन्थ थानपर गप्प सरक्काकेँ लागल ओ साँझ भोरक दोकान गाछ, वृक्ष, पोखरि, झाँखरि आइ सभ मोन पडैत अछि नै जानी किए शहरमे रहितो नजरि ओहने बात तकैत अछि © कुन्दन कुमार कर्ण