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जुलाई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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परिपक्व होइत मैथिली गजल: समीक्षा

ई कहब से कोनो अतिशयोक्ति नहिं जे 'मैथिली गजल' किछु साल पूर्व टिकुले रहए आइ बेस कोशा बनि तैयार भ ऽ  रहल छैक फल देबा लेल, तहियो में जँ सहजता पूर्वक मैथिलीक अपन गजलशाश्त्र भेटि जाए अन्चिनहार आखरक रूपमे तखन गजल लेल बेसी मेहनति क ऽ  खगते नहिं रहि जाइत छैक । अन्चिनहार आखरक रूपमे ई एकटा एहेन गजलशाश्त्र भेटल अछि जे मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे समर्थ सिद्ध भ ऽ  रहल अछि। मैथिली गजलक एकटा सुप्र सिद्ध नाम जे भारत सँ ल ऽ  क ऽ  नेपाल धरि अपन गजलसँ श्रोताक माँझ एकटा भिन्न छाप छोड़निहार गजलकार श्री 'कुन्दन कुमार कर्ण' जी केँ किछु गजल- kundangajal.com केर माध्यम सँ आ किछु हुनक फेसबुकक भीतसँ पढ़बाक मौका भेटैत रहैत अछि जे हमरा लेल सौभाग्यक गप्प छै ।  हुनक किछु गजल पर हम अपन विचार राखि रहल छी । 12 मई 2020 क ऽ  एकटा बाल गजल जे शाइरक अपन वेवसाईटपर प्रेशित कएल गेल छन्हिं जे निम्नलिखित अछिः हमर सुन्नर गाम छै  फरल ओत' आम छै  विपतिमे संसार यौ  प्रकृति जेना बाम छै  निकलि बाहर जाउ नै  बिमारी सभ ठाम छै  सफा आ स्वस्थ्य रहब  तखन कोनो काम छै  जनककें सन्तान हम  जनक

गजल - जिनगी एक टा खेल छी

जिनगी एक टा खेल छी सुख दुख केर ई मेल छी कहियो जे सुलझि नै सकत तेहन ई अगम झेल छी संयमतासँ जे नै रहत तकरा लेल ई जेल छी रूकत नै निरन्तर चलत ई अविराम सन रेल छी होइत अछि जखन दुख तखन दैवक बुझि चलू ठेल छी बहरे-मुक्तजिब © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल - प्रिय चलू संग एकातमे

प्रिय चलू संग एकातमे डुबि रहब मिठगर बातमे अनसहज नै बुझू लग हमर आउ बैसू हमर कातमे अछि बरसि रहल जे मेघ झुमि भीज जायब ग बरिसातमे गुन गुना लिअ गजल आइ जुनि संग मिलि केर सुर सातमे फेर एहन मिलत नै समय लिअ मजा प्रेमकेँ मातमे बहरे – मुतदारिक © कुन्दन कुमार कर्ण

हजल - एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा

प्रस्तुत कए रहल छी हम अपन पहिल हजल पढू ! हँसू !! हँ, मुदा प्रतिकृया जरुर करब -------------------------------------------- हजल एक दिन कनियांसँ भेलै झगडा मारलनि ठुनका कहब हम ककरा ओ पकडलनि कान आ हम झोंट्टा युद्ध चललै कारगिल सन खतरा मारि लागल बेलनाकेँ एहन फेक देलक आइ आँखिसँ धधरा बाघ छी हम एखनो बाहरमे की कहू ? घरमे बनल छी मकरा एसगर कुन्दन सकत कोना यौ ओ हजलकेँ बुझि लए छै फकरा मात्राक्रम: 2122-2122-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

कविता - गामक याद

गामक खेत, नदी आ ओ आमक फूलवारी खेतक कदवा, गँजार आ कुमरौरी, अदौरीकेँ तरकारी मरुवाकेँ रोटी आ मारा माछक चहटगर चटनी रौद कोन पानि कोन सभमे गीत गाबि कए खटनी फूलवारी महँक मचान, ताहिपर तासक विश्व कपकेँ घमासान महन्थ थानपर गप्प सरक्काकेँ लागल ओ साँझ भोरक दोकान गाछ, वृक्ष, पोखरि, झाँखरि आइ सभ मोन पडैत अछि नै जानी किए शहरमे रहितो नजरि ओहने बात तकैत अछि © कुन्दन कुमार कर्ण