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गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण मैथिली गजल

गजल - भावनामे बहू नै कखनो

Kundan Kumar Karna - www.facebook.com\kundan.karna

गजल - भावनामे बहू नै कखनो

भावनामे बहू नै कखनो दास मोनक बनू नै कखनो चित्त एकाग्र राखू सदिखन घोर चिन्ता करु नै कखनो मोह माया कऽ बन्धनमे यौ भुलि कऽ मरितो परु नै कखनो मीठ बोली सभक लग बाजू बात कटु सन कहू नै कखनो बाट जे लक्ष्य धरि नै पहुँचत ताहि बाटसँ चलू नै कखनो कर्म आधार छी जिनगीकेँ दूर एहिसँ रहू नै कखनो सूत्र छी किछु सफलताकेँ ई बात व्यर्थक बुझू नै कखनो मात्राक्रम : 2122-12222 © कुन्दन कुमार कर्ण

कता

जागू जागू सब मैथिल नारी

जागू जागू सब मैथिल नारी जानकी जकाँ बनू महान् दोसरकेँ संस्कृति नक्कल नै कऽ अपनकेँ राखू मान अपनो जागू आ सबकेँ जगाउ सुतू नै पीबि कऽ लाजक तारी घोघ तरसँ बाहर निकलू, बनू एक होसियार मैथिल नारी बिन बाजने अधिकार नै भेटत नै भेटत कतो कोनो सम्मान जागू जागू सब मैथिल नारी जानकी जकाँ बनू महान् बदरी तरकेँ चानसँ नीक स्वतन्त्र दीपकेँ ज्योति बनू कतेक दिन रहबै अन्हारमे बुद्धिकेँ ताला जल्दी खोलू बचाउ सोहर समदाओन नै हेरा दियौ लोक गीत कतो रहू संस्कार नै छोडू तखने हएत मिथिलाकेँ हित मैथिली लीखू, मैथिली बाजू बढाउ मिथिलाकेँ शान जागू जागू सब मैथिल नारी जानकी जकाँ बनू महान् रंग बिरंगी अरिपणसँ मिथिलाकेँ ई धरती सजाउ दुनियाँ भरिमे मैथिल नारीकेँ अदभूत कला देखाउ खाली चुल्हा चौकी केनाइ मात्र नै बुझू अपन काम डेग-डेग पर संघर्ष करु तखने अमर हएत नाम समय पर नै जागब त किछु नै एत भेटत असान जागू जागू सब मैथिल नारी जानकी जकाँ बनू महान् पवित्र कर्मसँ जानकी बनल अछि मिथिलाक विभुति जँ हुनके बाटपर चलबै तऽ नै आएत कोनो विपति हुनके जकाँ कर्म कऽ मिथिलामे चेतना कऽ दीप जराउ चेतनशील भऽ मिथिलामे शिक्षाकेँ ज्योति फैलाउ मैथलि नारी भेलापर अप