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मई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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परिपक्व होइत मैथिली गजल: समीक्षा

ई कहब से कोनो अतिशयोक्ति नहिं जे 'मैथिली गजल' किछु साल पूर्व टिकुले रहए आइ बेस कोशा बनि तैयार भ ऽ  रहल छैक फल देबा लेल, तहियो में जँ सहजता पूर्वक मैथिलीक अपन गजलशाश्त्र भेटि जाए अन्चिनहार आखरक रूपमे तखन गजल लेल बेसी मेहनति क ऽ  खगते नहिं रहि जाइत छैक । अन्चिनहार आखरक रूपमे ई एकटा एहेन गजलशाश्त्र भेटल अछि जे मैथिली गजलकेँ अरबी, फारसी ओ उर्दू गजलक समकक्ष पहुँचेबामे समर्थ सिद्ध भ ऽ  रहल अछि। मैथिली गजलक एकटा सुप्र सिद्ध नाम जे भारत सँ ल ऽ  क ऽ  नेपाल धरि अपन गजलसँ श्रोताक माँझ एकटा भिन्न छाप छोड़निहार गजलकार श्री 'कुन्दन कुमार कर्ण' जी केँ किछु गजल- kundangajal.com केर माध्यम सँ आ किछु हुनक फेसबुकक भीतसँ पढ़बाक मौका भेटैत रहैत अछि जे हमरा लेल सौभाग्यक गप्प छै ।  हुनक किछु गजल पर हम अपन विचार राखि रहल छी । 12 मई 2020 क ऽ  एकटा बाल गजल जे शाइरक अपन वेवसाईटपर प्रेशित कएल गेल छन्हिं जे निम्नलिखित अछिः हमर सुन्नर गाम छै  फरल ओत' आम छै  विपतिमे संसार यौ  प्रकृति जेना बाम छै  निकलि बाहर जाउ नै  बिमारी सभ ठाम छै  सफा आ स्वस्थ्य रहब  तखन कोनो काम छै  जनककें सन्तान हम  जनक

गजल - भावनामे बहू नै कखनो

Kundan Kumar Karna - www.facebook.com\kundan.karna

गजल - भावनामे बहू नै कखनो

भावनामे बहू नै कखनो दास मोनक बनू नै कखनो चित्त एकाग्र राखू सदिखन घोर चिन्ता करु नै कखनो मोह माया कऽ बन्धनमे यौ भुलि कऽ मरितो परु नै कखनो मीठ बोली सभक लग बाजू बात कटु सन कहू नै कखनो बाट जे लक्ष्य धरि नै पहुँचत ताहि बाटसँ चलू नै कखनो कर्म आधार छी जिनगीकेँ दूर एहिसँ रहू नै कखनो सूत्र छी किछु सफलताकेँ ई बात व्यर्थक बुझू नै कखनो मात्राक्रम : 2122-12222 © कुन्दन कुमार कर्ण

कता

कविता - जागू जागू सब मैथिल नारी

जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् दोसरकेँ संस्कृति नक्कल नै कऽ, अपनकेँ राखू मान अपनो जागू आ सबकेँ जगाउ, सुतू नै पीबि कऽ लाजक तारी घोघ तरसँ बाहर निकलू, बनू एक होसियार मैथिल नारी बिन बाजने अधिकार नै भेटत, नै भेटत कतो कोनो सम्मान जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् बदरी तरकेँ चानसँ नीक, स्वतन्त्र दीपकेँ ज्योति बनू कतेक दिन रहबै अन्हारमे, बुद्धिकेँ ताला जल्दी खोलू बचाउ सोहर समदाओन, नै हेरा दिओ लोक गीत कतो रहू संस्कार नै छोडू, तखने हएत मिथिलाकेँ हित मैथिली लीखू, मैथिली बाजू, बढाउ मिथिलाकेँ शान जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् रंग बिरंगी अरिपणसँ मिथिलाकेँ ई धरती सजाउ दुनियाँ भरिमे मैथिल नारीकेँ, अदभुत कला देखाउ खाली चुल्हा चौकी केनाइ मात्र नै बुझू अपन काम डेग–डेग पर संघर्ष करु, तखने अमर हएत नाम समय पर नै जागब, त किछु नै एत भेटत असान जागू जागू सब मैथिल नारी, जानकी जकाँ बनू महान् पवित्र कर्मसँ जानकी बनल अछि नेपालक विभुति जँ हुनके बाटपर चलबै तऽ नै आएत कोनो विपति हुनके जकाँ कर्म कऽ मिथिलामे, चेतना कऽ दीप जराउ चेतनशील भऽ मिथिलामे, शिक्षाकेँ ज्योति फैलाउ मै