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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल (मिथिला आन्दोलन विशेष)

बहराउ यौ मैथिल घरसँ मोनमे ई ठानि कऽ लेबे करब मिथिला राज्य आब छाती तानि कऽ हे वीर मैथिल देखाक वीरता अभिमानसँ आजाद मिथिलाकेँ लेल सब लडू समधानि कऽ हो गाम या शहर छी कतहुँ मुदा सब ठामसँ आबू करू आन्दोलन रहब जँ मिथिला आनि कऽ मेटा रहल अछि पहचान देखिते भूगोलसँ अस्तित्व ई धरतीकेँ बचाउ माए जानि कऽ इतिहास मिथिलाकेँ दैत अछि गवाही कुन्दन ई भूमि छी विद्वानक सदति चलल सब मानि कऽ मात्राक्रम : 2212-2221-2122-211 © कुन्दन कुमार कर्ण

बाल गजल

बाल गजल

फूल पर बैस खेलै छै तितली डारि पर खूब कूदै छै तितली भोर आ साँझ नित दिन बारीमे गीत गाबैत आबै छै तितली लाल हरिअर अनेको रंगक सभ देखमे नीक लागै छै तितली पाँखि फहराक देखू जे उडि-उडि दूर हमरासँ भागै छै तितली नाचबै हमहुँ यौ कुन्दन भैया आब जेनाक नाचै छै तितली मात्रक्रम : 212-2122-222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

दुख केर मारल छी ककरा कहू केहन अभागल छी ककरा कहू हम आन आ अप्पनकेँ बीचमे सगरो उजारल छी ककरा कहू नै जीत सकलहुँ आगू नियतिकेँ जिनगीसँ हारल छी ककरा कहू बनि पैघ किछु नव करऽकेँ चाहमे दुनियाँसँ बारल छी ककरा कहू कुन्दन पुछू संघर्षक बात नै दिन राति जागल छी ककरा कहू मात्राक्रम : 221-222-2212 © कुन्दन कुमार कर्ण