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कविता : पराती

रंग विरंगक भास छलै गीत गबैत परात रहै भोर कहै शुभभोर सदा बड्ड मजा छल बड्ड मजा आब दलानक शान कहाँ बूढ़ पुरानक गान‌ वला इन्टरनेटक शासनमे संस्कृति खातिर सोचत के छन्द : सारवती (ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ) Kundan Kumar Karna

शराब पर गजल

पचासम् गजल (शराब पर गजल)

तोहर याद नै आबै तँइ पी लए छी हम जिनगी आब दारुमे डुबि जी लए छी हम मतलब कोन छै हमरा दुनियासँ तोरा बिनु अपनेमे मगन रहि ककरो की लए छी हम दर्दक अन्हरीयामे पिअबाक मानक नै कहियो काल कम कहियो बेसी लए छी हम छै अलगे मजा स्वर्गक चुमनाइमे बोतल तोहर ठोर बुझि नित चुमि सजनी लए छी हम मजबूरी कहू या हिस्सक या नियत कुन्दन बस दुनियाक आगू बनि नेही लए छी हम मात्राक्रम : 2221-222-22-1222 © कुन्दन कुमार कर्ण