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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna
© कुन्दन कुमार कर्ण

बाल गजल

बाल गजल

खूब खाउ यौ बौआ  खूब गाउ यौ बौआ सूति उठि सबेरेमे  नित नहाउ यौ बौआ खेतमे चलू खेलब संग आउ यौ बौआ अंगनासँ बाहर जा नै सताउ यौ बौआ भूत सूत किछु नै छै डर भगाउ यौ बौआ  दाँत बड्ड उज्जर अछि मुस्कुराउ यौ बौआ आइ फेर कुन्दनकें लग बजाउ यौ बौआ फाइलुन्-मफाईलुन् © कुन्दन कुमार कर्ण

बाल गजल

बाल गजल

प्रकृति केर लीला अदभूत टिकल केहनो नै मजगूत चलल पूरबा छै धुरझार हवामे उड़ल टिकली फूत सजल छै समुच्चा संसार विधाताक रचना अजगूत कहल गेल बालक अवतार मनुष भूमि पर दैवक दूत उठब भिनसरे भोरे भोर समय पर हमर बौआ सूत उगल रवि किरण बदरी चीर गगनमे परम छवि साबूत लगनशील रहबै सब दिन जँ सफलता मिलत मिथिला पूत फऊलुन्-फऊलुन्-मफ़ऊल © कुन्दन कुमार कर्ण

बाल गजल

बाल गजल

हमर सुन्नर गाम छै फरल ओतऽ आम छै विपतिमे संसार यौ प्रकृति जेना बाम छै निकलि बाहर जाउ नै बिमारी सब ठाम छै सफा आ स्वस्थ्य रहब तखन कोनो काम छै जनककें सन्तान हम जनकपुर सन धाम छै अयोध्या छै घर जकर तकर नाओ राम छै कलम किनि दिअ ने लिखब बहुत सस्ता दाम छै मफाईलुन-फाइलुन © कुन्दन कुमार कर्ण