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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल

Tirhuta Lipi

गजल

रे हिया हमरा एतेक मजबूर नै कर चाहमे ककरो हमरेसँ तूँ दूर नै कर एकटा कित्ता अछि मोन सौँसे हमर ई बाँटि टुकड़ी-टुकड़ीमे अलग धूर नै कर काँच कोमल आ नवका जुआनी चढल छै आगि यादक यौवनमे लगा घूर नै कर एक त प्रेमक खातिर पिआसल रहै छी ताहि पर आरो उकसाक आतूर नै कर भागमे ककरा कुन्दन लिखल सब रहै छै कल्पनामे डुबि एना मोनके झूर नै कर 212-2222-122-122 © कुन्दन कुमार कर्ण

अन्तरवार्ता - रेडियो नेपाल

22 फरवरी, 2016 के रेडियो नेपालमे प्रत्यक्ष प्रसारित हमर अन्तरवार्तासँ सम्बन्धित किछु चित्र