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गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ © कुन्दन कुमार कर्ण Kundan Kumar Karna

गजल

कर्ममे एना रमा जाउ संगी स्वर्गमे सिड़ही लगा जाउ संगी भेटलै ककरा कथी मेहनत बिनु बाट गन्तव्यक बना जाउ संगी नै घृणा ककरोसँ नै द्वेष राखू नेह चारु दिस बहा जाउ संगी चित्तमे सुनगत अनेरो जँ चिन्ता धूँइयामे सब उड़ा जाउ संगी ठेस लागल ओकरे जे चलल नित डेग उत्साहसँ बढा जाउ संगी किछु करु हो जैसँ कल्याण लोकक नाम दुनियामे कमा जाउ संगी ओझरी छोड़ाक जिनगीक आबो संग कुन्दनके बिता जाउ संगी फाइलुन–मुस्तफइलुन–फाइलातुन © कुन्दन कुमार कर्ण