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  1. गजल

    Tuesday, June 23, 2020

    कर्कट बथुवा सब नामी छै ऐठां
    गुनधुन नै जकरो धामी छै ऐठां

    नारीकें पूजा ढाँढस मन्दिरमे 
    असलीमे नर सब कामी छै ऐठां

    जै क्षेत्रक बुधि नै तै पर दै व्याख्या
    बिनु मामा बहुते मामी छै ऐठां

    बूझत सम्झत सोचत के की किछुओ
    अनकर डेगे अनुगामी छै ऐठां

    चुप्पे रहबै कुन्दन जिनगी भरि हम
    साँचो बाजब बदनामी छै ऐठां

    22-22-22-22-22

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  2. गजल

    Saturday, June 20, 2020

    स्वर्ग हो या नर्क संगमे रहब
    प्रेममे जियबाक ढंगमे रहब

    लाख टुकड़ी करि शरीर देख लिअ
    बस अहीं टा अंग अंगमे रहब

    लाल पीयर आब कोन काजकें
    हम तँ सजनी केर रंगमे रहब

    आशमे जिनगी बिता रहल छलौं
    सांस मिलिते देर दंगमे रहब

    मानि कुन्दनकें बताह ले मुदा
    चाहमे ककरो उमंगमे रहब

    212-221-212-12

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  3. ई कोन खरापी जँ भागे खराप छै
    ऐठां तँ बहुतकें दिमागे खराप छै

    ओ मैल शरीरक अपन देखि नै सकल
    परिधानसँ उपराग दागे खराप छै

    खौकार मनुषकें बहन्ना हजार यौ
    खेबाक रहल माँछ सागे खराप छै

    पाखण्ड कते एहनो छै समाजमे 
    गरदनिसँ मुड़ी टेंड़ पागे खराप छै

    सिखनाइ सफल नै रहल तँइ कहल घुरै
    संगीत गजल गीत रागे खराब छै

    221-122-122-1212

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  4. कांटक ढेरीमे फूल खोजि रहल छी
    संकटमे हर्षक मूल खोजि रहल छी

    मौलाबै नै कतबो अकाल समयमे
    जीवनमे से अडहूल खोजि रहल छी

    कुर्सी अजबारल कोढियासँ अनेरो
    नेता देशक काजूल खोजि रहल छी

    लाखो छै कारण टूटबाक मनुषमे
    सभकें जोडै से पूल खोजि रहल छी

    इच्छा आकांक्षा लोभ मोहसँ कुन्दन
    अपने बन्हनके शूल खोजि रहल छी

    222-22-2121-122

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  5. जे अछि हियामे सब सुनाबू आइ
    दर्दक दवाई छै बताबू आइ

    आबू करू किछु आत्मबोधक बात
    संसार सूतल छै जगाबू आइ

    दुख भेल बर सुख भेल कनियाँ बूझि
    दुन्नू मिला जिनगी सजाबू आइ

    प्रेमी हजारौ प्रेम बिनु तडपैत
    टूटल हिया सभकें जुटाबू आइ

    नैनक करूणा मोन लेलक मोहि
    अपना हिया हमरा बसाबू आइ

    धरती कहीं नर्के जकाँ बनि जाइ
    वातावरण कुन्दन बचाबू आइ

    बहरे रजज मुसद्दस महज़ूफ

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  6. राति भरि जागले रहलियै हम
    ओकरे यादमे रहलियै हम

    प्रेममे कीसँ की बुझै दुनियाँ
    साफ नै काजके रहलियै हम

    लोक फेकै हमर उपर पाथर
    हर्षमे नाचिते रहलियै हम

    घरसँ बाहर निकालिए देलक
    चान तरमे भने रहलियै हम

    होश हेरा अचेत बनि गेलौं
    दूर अपनेसँ जे रहलियै हम

    देह मेटाक सांसमे सीमित
    सृष्टिमे एतबे रहलियै हम

    गप्प दुनियाँक जे चलै कुन्दन
    आब नै लोक से रहलियै हम

    बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  7. दुनियाक आंगुर पर नचा लेब हम
    तोहर हिया जे घर बना लेब हम

    सब औपचारिकता हटा लेब हम 
    परिणय अकासे तर रचा लेब हम

    बस तों हँ कहि दे डटि सभक सामने
    चुटकीसँ गौंआके मना लेब हम

    परदामे राखू चेहरा जुनि अपन
    बेगरता पड़ला पर बजा लेब हम

    प्रिय मानलौं दायित्व बढ़लै बहुत
    जीवन कठिन कतबो बिता लेब हम

    तोहर खुशी हमरो खुशी आब छै
    नैना भरल रहितो हँसा लेब हम

    कुन्दन निहारल नित करब ओकरे
    तस्वीर छातीमे सजा लेब हम

    बहरे रजज मुसद्दस (मुज़ाहिफ़ रूप)
    (चारिम शेरमे एक टा दीर्घक मात्रा गिराएल गेल छै)

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  8. ककरो पात भात नै ककरो घर खीर
    ई केहन समाजवादक अछि तस्वीर

    शासक केर आँखिमे सठि गेलै पानि
    हे ईश्वर ककर सहत के ऐठां पीर

    दुर्योधन मरल कहाँ मरदक मानससँ
    नव-नव विधिसँ हरि रहल नारीके चीर

    दोसर पर विजय सदति मनुषक छै सोच
    जे अपनाक जीत लेलक से अछि वीर

    देशक माटिमे मिलल छै हमरो घाम
    दे हिस्सा समान दै छी धनियाँ जीर

    विचलित छै समाज सगरो झूठक भीड
    चिन्ता छोडि मोन कुन्दन राखू थीर

    मफ़ऊलात-फ़ाइलातुन्-मफ़ऊलात

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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