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  1. जिनगी एक टा खेल छी
    सुख दुख केर ई मेल छी

    कहियो जे सुलझि नै सकत
    तेहन ई अगम झेल छी

    संयमतासँ जे नै रहत
    तकरा लेल ई जेल छी

    रूकत नै निरन्तर चलत
    ई अविराम सन रेल छी

    होइत अछि जखन दुख तखन
    दैवक बुझि चलू ठेल छी

    बहरे-मुक्तजिब

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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