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  1. गजल

    Monday, November 3, 2014

    एहि हारल आदमीकेँ हालचाल नै पुछू
    दर्द सुनिते जाइ बढि तेहन सवाल नै पुछू

    मारि किस्मत गेल कखनो खेल खेलमे लटा
    घर घरायल नित बिपतिमे कोन काल नै पुछू

    संग अपनो नै जरूरतिकेँ समय कतहुँ रहल
    केलकै कोना कखन के आल टाल नै पुछू

    बाट जिनगीकेँ रहल जे डेग डेगपर दुखद
    बीत कोना गेल ई पच्चीस साल नै पुछू

    के मरै छै एत यौ कुन्दन ककर इयादमे
    लोक लोकक खीच रहलै आब खाल नै पुछू

    मात्राक्रम: 2122-2122-2121-212

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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