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  1. गजल

    Friday, January 16, 2015

    तोरा आदर कि केलियौ तूँ त हमरा सस्ता बुझि लेलही
    बस अपनाकेँ गुलाब हमरा सुखल सन पत्ता बुझि लेलही

    मोनक कुर्सी कि देलियौ बैस तोरा एके छन लेल हम
    हमरे जिनगीक तूँ अपन राजनीतिक सत्ता बुझि लेलही

    गजलक गंभीरता मधुरता असलमे तोरा की मालूम
    हमरा शाइर त बात दूरक अपन तूँ भगता बुझि लेलही

    शारीरिक हाउ भाउ तोहर बुझाइत रहलहुँ एना सदति
    जेना नेहक रहै पहिल बेर हमरे खगता बुझि लेलही

    नै छै जै मोनमे रहल चाह नेहक कोनो कुन्दन हमर
    तै मोनसँ हम किएक जोडब अधूरा नाता बुझि लेलही

    मात्राक्रम : 22221-212-2122-222-212

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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