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  1. गजल

    Sunday, July 30, 2017

    भरल बरिसातमे नै सताउ सजनी
    किए छी दूर लग आबि जाउ सजनी

    मिलनके आशमे अंग-अंग तरसै
    बदन पर वुँद नेहक गिराउ सजनी

    पिआसल मोन मधुमासमे उचित नै
    जुआनी ओहिना नै गमाउ सजनी

    जियब जा धरि करब नेह हम अहीँके
    हियामे रूप हमरे सजाउ सजनी

    खुशीमे आइ कुन्दन गजल सुनाबै
    मजा एहन समयके उठाउ सजनी

    122-212-212-122

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  2. गजल

    Monday, July 17, 2017

    अपनके अपना हिसाबे बुझू
    रचलके रचना हिसाबे बुझू

    असलमे सब किछु रहै छै कहूँ
    सृजनके सृजना हिसाबे बुझू

    हिया पर शब्दक असर जे पड़ै
    गजलके गहना हिसाबे बुझू

    कहाँ भेटत सोच उठले सभक
    धसलके धसना हिसाबे बुझू

    जरनिहारोके कतहुँ नै कमी
    जरलके जरना हिसाबे बुझू

    अतीतक नै याद कुन्दन करू
    घटलके घटना हिसाबे बुझू

    122-221-2212

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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  3. गजल

    Wednesday, July 5, 2017

    जे कल्पनामे डुबा दै ओ छथि कवि
    जे भावनामे बहा दै ओ छथि कवि

    शब्दक मधुरतासँ करि मति परिवर्तन
    जे दू हियाके मिला दै ओ छथि कवि

    साहित्य मानल समाजक अयना छै
    जे सोचके नव दिशा दै ओ छथि कवि

    खतरा प्रजातन्त्र पर जौँ-जौँ आबै
    जे देश जनता जगा दै ओ छथि कवि

    संसार भरि होइ छै झूठक खेती
    जे लोकके सत बता दै ओ छथि कवि

    रचनासँ कुन्दन करै जादू एहन
    जे चान दिनमे उगा दै ओ छथि कवि

    2212-2122-222

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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