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  1. गजल

    Tuesday, December 25, 2018

    मालूम नै छल तोहर नैना चितचोर गे
    जहियासँ मिललै धरकन मारै हिलकोर गे

    अदहन सिनेहक जे चाहक चूल्हापर चढ़ल
    खदकल हियामे अगबे मिलनक इनहोर गे

    रूमीक कविता सन मार्मिक तुकबन्दी जकाँ
    दुनियाँक कोनो कवि लग नै तोहर तोड़ गे

    शीशा जकाँ आखर आ पानी सन भाव छै
    कहलहुँ गजल तोरे नाँओ भोरे भोर गे

    बस एक तोरे आगू कोमल बनि जाइ छी
    चलतै हमर जिनगीपर की ककरो जोर गे

    लुत्ती सुनगि गेलै प्रेमक अगहन मासमे
    बैशाख धरि हेबे टा करतै मटिकोर गे

    दोसर नजरिके कुन्दन सोहाइत आब नै
    चाहे रहै कारी या अछि केओ गोर गे

    221-222-222-2212

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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