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  1. गजल

    Saturday, July 4, 2020

    सहजे खुजै से ससरफानी कोन काजकें
    केलासँ पछताइ मनमानी कोन काजकें

    एते असानीसँ नै मिलबो हम तड़प कनी
    सस्ते बिकत फेर से चानी कोन काजकें

    लिअ दान तकरेसँ जे नै बाजल फिरै कतौ 
    दै ढोलहा भरि नगर दानी कोन काजकें 

    संसदसँ उपदेश दै छै साउध समान ओ
    करनी जकर ठीक नै वाणी कोन काजकें

    मस्तक सजल ताज जुरगुट्टीमे गुलाब हो
    राजा रहत नै रहब रानी कोन काजकें

    2212-2122-2212-12

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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