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  1. गजल

    Friday, July 17, 2020

    लगा आगि ओ पानि ढारै अपने
    अछैते बसल घर उजारै अपने

    तमासा कहब की बुझू अज्ञानी
    उडा धान खखरीक लारै अपने

    रहल ठोर चुप्पे मुदा नैना सब
    दबल बात मोनक उघारै अपने

    प्रतीक्षा जबाबक अधूरे रहलै
    लिखै पत्र आओर फारै अपने

    किए लोक लोकेसँ नै डेरेतै
    अपन लोककें जे बजारै अपने

    मिलै लेल तैयार छी हम कुन्दन
    समय देत ओ फेर टारै अपने

    122-122-122-22

    (बहरे मुतकारिब मुसम्मन अस्लम)

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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