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  1. गजल

    Wednesday, August 5, 2020

    दुन्नू आँखि मूनि बाजै छह अन्हार छै
    अपने चालि ठीक नै गलते संसार छै

    बेगरता बहुत सकरता नुनक नै छलै
    सत्ता पाबिते बनल‌ धनकें पैकार छै

    पैसा जाति धर्ममे जनते बंटल मुदा
    भ्रष्टाचार लेल बस दोषी सरकार छै

    धरतीयोक धीर टुटलै लीला देखिते
    उब्जाबै वला दुबर बेचै बौकार छै

    सम्हरि नै‌‌ रहल महामारी दुनियाँ बुते
    असरा आब गामकें बाबा डिहबार छै

    2221-2122-2221-2

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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