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  1. गजल

    Monday, September 14, 2020

    दोसरकें बात पर नै उछल
    एको डेग अपनासँ तूँ चल

    अपने वुद्धि काज देतौ‌ रे
    चाहे छी मूर्ख चाहे पढ़ल

    लोहा सेहो लीबि जाइ छै
    बोली जे रहतौ मीठ सरल

    संघर्षे कऽ नाम छै जिनगी
    घर बैसि भेटलै ककरा फल 

    शमशान रहल हेतै कहियो
    जै ठां देखै छी आइ महल

    ओकर चुप्पी बुझाइ नाटक
    ओ जे बाजै त लागै गजल

    दुनियासँ भागब किए कुन्दन
    दलदलमे रहि खिलै छै कमल

    बहरे मीर

    © कुन्दन कुमार कर्ण

  2. 1 comments:

    1. Unknown said...

      अहाँ के गजल सुइन बिभूर्त भगेलौ

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