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विशेष

कविता : पराती

रंग विरंगक भास छलै गीत गबैत परात रहै भोर कहै शुभभोर सदा बड्ड मजा छल बड्ड मजा आब दलानक शान कहाँ बूढ़ पुरानक गान‌ वला इन्टरनेटक शासनमे संस्कृति खातिर सोचत के छन्द : सारवती (ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ) Kundan Kumar Karna

कविता - हम आधुनिक समाज छी

हम आधुनिक समाज छी
हमरामे नै चेतना रहलै
नै दशर्न रहलै
नै अध्ययन रहलै
सब किछु बिसरि गेल छी
हम त मरि गेल छी

कविता




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