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  1. गजल

    Sunday, April 30, 2017

    एखन हारल नै छी खेल जितनाइ बाकी छै
    इतिहासक पन्नामे नाम लिखनाइ बाकी छै

    गन्तव्यक पथ पर उठलै पहिल डेग सम्हारल
    अन्तिम फल धरि रथ जिनगीक घिचनाइ बाकी छै

    विद्वानक अखड़ाहामे करैत प्रतिस्पर्धा
    बनि लोकप्रिय लोकक बीच टिकनाइ बाकी छै

    लागल हेतै कर्मक बाट पर ठेस नै ककरा
    संघर्षक यात्रामे नोर पिबनाइ बाकी छै

    माए मिथिला नै रहितै तँ के जानितै सगरो
    ऋण माएके सेवा करि कऽ तिरनाइ बाकी छै

    सब इच्छा आकांक्षा एक दिन छोडिकेँ कुन्दन
    अन्तर मोनक परमात्मासँ मिलनाइ बाकी छै

    2222-2221-221-222

    © कुन्दन कुमार कर्ण
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