Rss Feed
  1. गजल

    Monday, July 17, 2017

    अपनके अपना हिसाबे बुझू
    रचलके रचना हिसाबे बुझू

    असलमे सब किछु रहै छै कहूँ
    सृजनके सृजना हिसाबे बुझू

    हिया पर शब्दक असर जे पड़ै
    गजलके गहना हिसाबे बुझू

    कहाँ भेटत सोच उठले सभक
    धसलके धसना हिसाबे बुझू

    जरनिहारोके कतहुँ नै कमी
    जरलके जरना हिसाबे बुझू

    अतीतक नै याद कुन्दन करू
    घटलके घटना हिसाबे बुझू

    122-221-2212

    © कुन्दन कुमार कर्ण
    Reactions: 
    |
    |


  2. 0 comments:

    Post a Comment