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  1. गजल

    Wednesday, December 23, 2020

    चलाकक शहरमे चलाकी कऽ विधि जानि लेलौं 
    गजब भेल चालनिसँ हम पानि जे छानि लेलौं 

    बहुत दिनसँ खोजैत रहियै अपन शत्रुके हम 
    अचानक नजरि ऐना पर गेल पहिचानि लेलौं 

    मिला देत ओ माटिमे हमरा धमकी दऽ गेलै 
    जनमि गाछ छू लेब हमहूँ गगन ठानि लेलौं 

    कते साक्ष्य प्रस्तुत करू आर प्रेमक परखमे 
    अहाँ केर पाथर हिया देवता मानि लेलौं 

    कलीके खिलल‌ देखि बचपन पड़ल मोन काइल 
    भसाबैत निर्मालके देखिते आइ हम कानि लेलौं 

    विरहमे किए मित्र जिनगी बितेबै अनेरो 
    पहिल छोड़ि गेलै त की दोसरो आनि लेलौं 

    अलग बात छै ई जे हम होशमे नै छी 'कुन्दन' 
    भले लड़खड़ाइत अपन ठाम ठेकानि लेलौं 

    122-122-122-122-122 
    (बहरे मुतक़ारिब मोअश्शर सालिम) 

    © कुन्दन कुमार कर्ण 

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