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विशेष

गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

मैथिली गजलक अकाश पर अर्धज्ञानक बदरी

अनुशासन+विद्रोह=परिवर्तन
अनुशासनहीनता+विद्रोह=अराजकता

अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा बभूवथुः

(ॠगवेदक ई मंत्र अछि जाहिमे अग्नि ओ सोमदेवक निमंत्रण देल गेल छनि आ कहल गेल छनि जे अहाँ दूनू ऐश्वर्यसँ भरल छी, अहाँ दूनू देवत्वसँ युक्त छी। अहाँ दूनू गोटे संयुक्त रूपे एहिठाम आमंत्रित छी। अहाँ दूनू गोटे हमर स्तुति स्वीकार करी। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे हमर हरेक आलोचना लेल लेखक ओ पाठक दूनू सादर आमंत्रित छथि। दूनूक यथायोग्य सत्कार कऽ हम अपनाकेँ भाग्यवान बूझब)।

मैथिली साहित्यमे एकटा परंपरा छै जे कोनो गलतीकेँ वेद वाक्य मानि लगभग पूरा लोक ओही गलतीकेँ पकड़ि जीवन भरि चलताह आ मैथिली साहित्यकेँ गलत परंपराक इनारमे खसबैत रहताह। खास कऽ मैथिली गजलक संदर्भमे तँ ई बात आरो देखल जाइए। अही क्रममे हम अरविन्द ठाकुरजीक पोथी "मीन तुलसीपात पर" केर चर्च करब। एहि पोथीमे गजलक व्याकरण आदिक बारेमे एहन प्रश्न सभ उठाएल गेल छै जकर कोनो विशेष माने नै लागै छै। गजलक व्याकरण नहि हो ताहि लेल एहनो बात कहल गेल छै जकर गजल विधासँ कोनो लेना-देना नै छै। आब अरविन्दजीक एहि पोथीक भूमिकाकेँ किछु युवा सत्य मानि लेने छथि। एकर माने ई भेल जे अरविन्द ठाकुर गलत करताह तँ ईहो सभ ओकरा मानि लेताह। युवा केर की अर्थ छै, गलतकेँ हटा सहीकेँ प्रचलन करब वा कि मंच-पुरस्कार लेल गलतकेँ मानि लेब। गलतकेँ मानि चलए बला युवा भइए ने सकैए। अरविन्द ठाकुर अपन पोथीक भूमिकामे की लिखलाह, जे लिखलाह से सही अछि कि गलत, आ ओहि सही-गलत केर आधार की छै से ताकब हमर एहि आलेखक मूल काज अछि। आब एतेक लिखलाक बाद बुझिए गेल हेबै जे "मीन तुलसीपात पर" सेहो एहन पोथी अछि जकर रचनामे बहरक पालन नै भेल अछि आ काफियाक सेहो बहुत दोष अछि। गजल लेल बहर आ काफिया अनिवार्य तत्व छै। जँ बहर-काफिया हेतै तखने ओ गजल बनतै आ तकर बादे ओ गजल नीक छै कि खराप ताहिपर बहस हेतै।


एहि पोथीमे रचनाक अतिरिक्त 37 पन्नाक भूमिका लिखने छथि अरविन्द ठाकुरजी जकर शीर्षक अछि "संहिताक उपनिवेश नहि अछि साहित्य" आ एहि भूमिकाक शुरूआते कठोपनिषद् केर वचन "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत"सँ भेल अछि। मुदा अर्धाली रूपमे। एहन-एहन अर्धाली अरविन्दजी आरो प्रयोग केने छथि अपन भूमिकामे। आगू बढ़बासँ पहिने "संहिता" केर अर्थ जानी संहिता केर सरल अर्थ छै संकलन आ रूढ़ अर्थ छै नियमक संकलन। एकर मतलब भेल जे अरविन्द ठाकुरजी साहित्यकेँ नियमक वा नियम-संकलनक उपनिवेश नै मानबाक आग्रह केने छथि। मुदा जँ साहित्य केर अर्थमे देखबै तँ अरविन्द जीक आग्रह साफे विरोधाभासी अछि। कारण हरेक साहित्य अपना आपमे नियमक संकलन होइत छै। अरविन्दजीक एहि पोथीक बहुत रचना नियम अछि आ तँइ ईहो पोथी संहिता बनि गेल अछि। आब साहित्य केर रचना सत्ता लेल छै, कि जनता लेल छै कि लेखके लेल छै से बात अलग भेल। जेना संहिता संकलन समाजकेँ नैतिकता हिसाबें नियंत्रण करै छै तेनाहिते जे साहित्य जनता लेल छै ओ साहित्य सेहो सत्तापर नैतिकता हिसाबें नियंत्रण करबाक प्रयास करै छै। जे साहित्य सत्ता लेल छै ओ साहित्य जनतापर नियंत्रण करबाक प्रयास करै छै। अपनापर नियंत्रण करबाक लेल बहुत कम साहित्य लिखल गेल अछि। अरविन्दजीक रचना पढ़ि अनुमान लगाएल जा सकैए जे ओ केकरापर नियंत्रण करबाक लेल संहिता रूप लेने अछि। हमर मूल कथन जे साहित्य अंतिम रूपमे संहिते होइत छै। एकरा अहाँ पानि-बर्फ वा मेघ-पानि बला उदाहरणसँ नीक जकाँ बूझि सकैत छी। तँइ हम कहलहुँ जे अरविन्दजीक भूमिकाक शीर्षक विरोधाभासी अछि।

अपना समाजक विद्वानक बीच अर्धाली बहुत चलै छै। अर्धाली मतलब कोनो प्रसंगक आधा उल्लेख करब। ई समय बचेबाक लेल होइत छै मुदा ई अर्धाली मात्र शिक्षित ताहूमे सर्वज्ञाता लेल होइत छै। जनता लेल अर्धालीक प्रयोग तँ सर्वथा अनिष्टकारक होइत छै। चतुर लोक मात्र अर्धाली प्रयोग कऽ अपन अभीष्ट सिद्ध कऽ लै छथि। एहने एकटा चतुर लोक छलाह युधिष्ठिर जे कि युद्धमे "अश्वत्थामा हतो..." एहि अर्धालीक प्रयोग कऽ अपन स्वार्थ सिद्ध कऽ लेलाह। महाभारत केर प्रसंग छै ई जे गुरू द्रोण जखन अपन कौशलसँ दुर्योधनकेँ जिता रहल छलाह तखन हुनका विचलित करबाक लेल हुनकर बेटा अश्वत्थामाक नामपर एक वाक्य रचल गेल "अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो" माने अश्वत्थामा मारल गेल आदमी वा हाथी। मुदा घोषणा कालमे एकर अर्धाली "अश्वत्थामा हतो" साफ-साफ बाजल गेल आ दोसर भाग "नरो वा कुंजरो"केँ शंख ध्वनिसँ दाबि देल गेल। एकर असरि ई भेलै जे द्रोण ई बुझलाह जे हमर बेटा अश्वत्थामा मारल गेल आ ओ शोकमे आबि युद्ध छोड़ि देलाह। परिणाम पांडव युद्ध जीति लेलाह। हम ई बिल्कुल नै कहै छी जे अरविन्द जी युधिष्ठिर जकाँ चतुर छथि वा कि ओहो कोनो युद्धपर निकलल छथि। हमर कहब अतबे जे जखन कोनो प्रसंगक उलेल्ख करी तँ पूरा करी। जाहि श्लोक सभहक अर्धालीक ओ प्रयोग केने छथि से श्लोक सभ छंदमे बान्हल मात्र किछुए शब्दक श्लोक छै जेना "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥"। देखियौ बेसी लंबा-चौड़ा तँ छै नै तखन ओकरा पूरा देबामे कोन दिक्कत? एकटा आर प्रसिद्ध अर्धाली देखबै छी- "अहो रूपं अहो ध्वनि:" एकर मतलब ई छै जे अहा की रूप छै, कि ध्वनि छै। माने प्रसंशा भेलै। जनता एकरा अपन प्रेमिका लेल सेहो प्रयोग कऽ सकैए। मुदा एहि अर्धालीक पूरा रूप एना छै " ऊष्ट्राणां विवाहेषु, गीतं गायन्ति गर्दभा: | परस्परं प्रशंसन्ति, अहो रूपं अहो ध्वनि:" आब एकर पूरा माने भेलै "ऊँटक बियाहमे गदहा गीत गेलकै आ दूनू एक दोसरक प्रसंशा केलकै। गदहा ऊँटकेँ कहलकै जे अहाँ की रूप अछि अहाँक आ तकरक जबाबमे ऊँट कहलकै जे अहाँ की ध्वनि अछि अहाँक। तँ बुझि गेल हेबै जे साधरण जनता लेल अर्धाली कतेक भयंकर परिणाम दै छै। हमरा लग अर्धालीपर बहुत रास प्रसंग अछि मुदा उदाहरण लेल मात्र दू टा देलहुँ। अरविन्दजी कहि सकै छथि जे जनता सर्वज्ञाता होइत छै।

अरविन्दजी संहितासँ साहित्यकेँ अलग करै छथि मुदा ओ अपन भूमिकामे जतेक अर्धाली देने छथि से छंदक संहितासँ संचालित छै। हुनकर पहिले अर्धाली बला श्लोक देखी- "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥" हम जतेक जनैत छी एहि पूरा श्लोकमे कुल 48 टा अक्षर छै आ ई जगती छंद भेलै (जँ हम गलत होइ तँ ओकरा सुधारबाक लेल आलोचना सादर आमंत्रित अछि)। जगती छंदमे हरेक पादमे अलग-अलग अक्षर संयोजन हिसाबें अलग-अलग नाम पड़ैत छै आ इएह बात आनो छंद जे गायत्री, अनुष्टुप, त्रिष्टुप आदिपर लागू होइत छै। मने अरविन्दोजीकेँ अपन बात कहबाक लेल संहिते केर जरूरति पड़लनि। ई अरविन्दजीक दोसर विरोधाभास छनि। एहि भूमिकामे जे आन श्लोकक उदाहरण अछि सेहो सभ पूरा छंदमे छै। एकर माने ईहो भेल जे तात्कालिक कारण जे हो मुदा अरविन्दजीकेँ ई बात पता छनि जे बिना संहिताकेँ अपन बात नै कहल जा सकैए। "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥" एहि श्लोकक सरल अर्थ छै जे "उठू, जागू आ वरिष्ठक संगमे आबि ज्ञान लिअ मुदा ई काज तलवारक धारपर चलि कऽ पार करब समान अछि से बात कवि (ॠषि) कहै छथि। एहि श्लोकक पहिल भाग महत्वपूर्ण अछि मुदा तकर कारण दोसर भाग छै। दोसर भागमे ई कहल गेल छै जे ई काज तलवारक धारकपर चलबाक समान छै? कोन काज तँ पहिल भागमे छै वरिष्ठक संग आ उठब-जागब। आब एहि ठाम ईहो प्रश्न छै जे कोन वरिष्ठ? जे उम्रमे नमहर होथि वा ज्ञानमे, जे एक ज्ञान नमहर होथि कि दोसर ज्ञानमे?। लोक अपन वरिष्ठे तकबामे समय गमा देताह तखन उठताह वा जगताह कोना। तँइ एहि काजकेँ तलवारक धारपर चलब मानल गेल छै। असल काज छै वरिष्ठे ताकब मुदा कोन वरिष्ठ? सही दिस लऽ कऽ जाए बला कि गलत दिस लऽ जकऽ जाए बला?। जे सही वरिष्ठ ताकि लै छथि से उठि जाइ छथि, जागि जाइ छथि आगू बढ़ि जाइ छथि। जाहि भूमिपर ई संहिता रचल गेल ताही भूमिपर दत्तात्रेय सेहो भेल छथि जिनका अपन वरिष्ठ एहनो चीजमे भेटि गेल रहनि जकरा समाज कोनो जोगरक नै मानै छथि। दत्तात्रेय अपन 24 टा गुरू रखने रहथि तकर सूची देखू- 1) पृथ्वी, 2) जल, 3) वायु, 4) अग्नि, 5) आकाश, 6) सूर्य, 7) चन्द्रमा, 8) समुद्र, 9) अजगर, 10) कपोत, 12) फतिंगा, 12) माछ, 13) हिरन, 14) हाथी, 15) मधुमाछी, 16) मधु निकालए बला, 17) कुरर पक्षी, 18) कुमारि कन्या, 19) नाग, 20) बालक, 21) पिंगला वैश्या, 22) तीर बनए बला, 23) मकड़ी, 24) भृंगी कीट। एहि सूचीमे कोन वरिष्ठ आ केहन वरिष्ठ सभ छथि से ताकि लिअ। पद-पोस्ट, धन-छलसँ पोषित मैथिली साहित्यकार सभ एहि सूचीमे देल वरिष्ठ सभकेँ अपना लेल वरिष्ठ मानताह से संदेह अछि।


आब एहि भूमिका केर आन प्रसंगपर आबी। आन प्रसंग सभकेँ हम प्वाइंट बना कऽ दऽ रहल छी। पहिने अरविन्दजीक कथन रहतनि आ तकर निच्चा हमर समर्थन वा विरोध रहत। अरविन्दजी अपन भूमिकामे जे बात उठेने छथि तकर उत्तर हम बहुत पहिने अपन पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"मे विस्तारसँ देने छी। एहिठाम हम प्रसंगानुकूल संक्षिप्त रूपे दऽ रहल छी। एकटा बातक उल्लेख करब जरूरी बुझाइए जे अरविन्दजी हिंदीक किछु आलोचना पढ़ि ओतहिसँ प्रश्न उठेने छथि। जँ अहाँ सभ देवेन्द्र आर्यजी द्वारा लिखल हुनक आलोचना "हिन्दी ग़ज़ल आलोचना की दिक्कतें" पढ़बै तँ बुझि जेबै जे अरविन्दजी कोन प्रश्न किम्हरसँ लेने छथि (देवेन्द्र जीक ई आलेख पहल पत्रिका, बर्ख 2015 मे प्रकाशित भेल रहै)। अइ संदर्भमे हमर कहब ई अछि जे हिंदी भाषामे गजल संगे जे किछु दिक्कत छै ताहिसँ मैथिलीकेँ कोन मतलब छै। मैथिली गजलक अपन समस्या छै आ तकरा नीक करब मैथिलिएसँ सभंव छै। उदाहरण लेल हिंदीमे बलाघात नै छै, मैथिलीमे छै तँ स्वाभाविक रूपे मैथिलीमे काफिया आ हिंदीमे काफियाक प्रकृति अलग हेतै आ ओहने नियमसँ संचालित हेतै। ई बात सभ हमरा एहिठाम अइ कारणसँ लिखए पड़ल जे बहुत रास मैथिल हिंदी बला गजलक व्याकरण पढ़ि बहस करै छथि जे मैथिलीमे एना किएक नै? तँ आब अरविन्दजीक भूमिकाक अंश आ तकर हमरा द्वारा कएल समर्थन वा कि विरोध देखू---

1) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहि क्रममे अनेक रास बनल-बनाओल ढाँचा-संरचना हिलैत अछि- किछु हिलिकए टेढ़ भए जाइत अछि, किछु भरभराए कए टूटि जाइत अछि। एहि विस्फोट, एहि विघटनसभक परिणाम होइ छै जे हिंसा-प्रतिहिंसा, पुणर्निर्माण, पुनर्वास, उत्तराधिकार आ ध्वस्त ढाँचासभक प्रेत-छाया ओहि काल-विशेषक अलंकार शास्त्रक (Rhetoric) प्रमुख हिस्सा भए जाइ छै। साहित्य केना एहि सभ सन्दर्भसँ अनछुअल रहि सकै छै, रहिए नहि सकै छै.."

हमर कथन- हँ, साहित्य सेहो परिवर्तनसँ कात नै रहि सकैए मुदा अतबो आ एहनो परिवर्तन नै होइ छै जे साफे-साफ निशान मिटा जाइ। असलमे अरविन्दजी परिवर्तनकेँ विनाश मानि लेने छथि जखन कि परिवर्तन मात्र स्वरूपकेँ सुंदर वा कि सरल बनेबाक बात करै छै। जाहिमे स्वरूप बदलियो सकैए आ नहियो बदलि सकैए। मुदा जँ स्वरूप बदलतै तँ नाम सेहो बदलि जाइत छै । उदाहरण लेल एना बूझू जे वैदिक साहित्य सरल वार्णिक छंदमे अछि मने एहन छंद जे अक्षरक संख्यासँ संचालित होइत अछि। अनुष्टुप छंदमे 32 अक्षर होइत छै। बादमे अनुष्टुप केर किछु स्थानपर लघु-गुरू केर स्थान नियत भेलै मुदा अक्षर बत्तीसे रहलै तँइ ओकर नाम अनुष्टुपे रहलै। बादमे एही छंदमे परिवर्तन भेलै आ अक्षरक संगे पूरा मात्राक्रम सेहो नियत कऽ देल गेलै जकरा वार्णिक छंद कहल गेलै आ अक्षर संचालित छंदक प्रयोग कम होइत गेलै। बादमे वार्णिक छंदक प्रचलन सेहो कम भेलै आ तकरा बदला मात्रिक छंदक प्रयोग होबए लगलै। एहि उदाहरणसँ स्पष्ट होइए जे छंदक स्वरूप बदलिते ओकर नाम बदलैत गेलै मुदा छंदक महत्व रहबे केलै।

गजलोमे इएह छै। जे बहर अरबी भाषामे प्रचलित भेलै से फारसीमे नै आ जे फारसीमे प्रचलित भेलै से उर्दूमे नै। इएह बात मैथिली गजल लेल सेहो छै। 1222-1222-1222... बहर उर्दूमे अतिप्रचलित छै मुदा संभव जे ई मैथिली भाषाक अनुकूल नै हो आ तकरा बदला 121-1221-1221 वा 1212-1221-1212 वा कि एहने सन आन बहर आबि जाए। तँ ई भेलै परिवर्तन। एहन नै हेतै जे परिवर्तनक नामपर साफे-साफ छंद वा बहरकेँ हटा देल जेतै।

2) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "इतिहासपर दृष्टिपात करी, त स्पष्ट देखाइत अछि जे प्रत्येक काल-विशेषक मनुष्य ओहि काल-विशेषमे अपन कार्य-कुशलता, क्षमता आ परिणामदायी चेतनाक रेखांकन लेल नव औजार, नव उपकरणक आविष्कार कएलक अछि आ अनुपयोगी वा पिछड़ल औजारसभक त्याग कएलक अछि.."

हमर कथन- अरविन्दजीक पहिले कथनक छायामात्र अछि ई बात। तँइ पहिले कथन बला हमर उत्तर अहूपर लागू हएत।

3) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "भगवतीचरण वर्मा कहै छथि– नव कवितामे लय आ छन्दके निरर्थक बुझल गेल अछि। किएक त लय आ छन्दक मान्यता प्राचीन छै आ जे किछु प्राचीन छै, ओ सड़ल-गलल छै, ओकरा नष्ट हेबाकहि चाही.."

हमर कथन- नव कवितामे जे भऽ रहल छै ताहिसँ उपन्यास वा आलोचना विधाक शिल्पपर कतेक प्रभाव पड़लै से किएक ने कहि रहल छथि अरविन्दजी। जहिया ई बात कहि देता तहिया हमहूँ नव कविताक शिल्पसँ गजलक शिल्पक संबंध कहि देब। रेल गाड़ीक ढाँचा परिवर्तनसँ हवाइ जहाजक ढाँचापर की प्रभाव पड़तै से जनबाक लेल हमहूँ अधीर छी।

4) अरविन्दजी फेर अर्धाली लीखै छथि जे- "गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति...."

हमर कथन- मैथिलीमे अवधी, ब्रजभाषा आदिक प्रभावें रस, रीति आ अलंकार आदिपर बहुत चर्चा भेलै मुदा ऐ सभहँक कारणें वाक्य असंतुलित होइत गेलै मने वाक्य केर स्वाभाविकता मरैत गेलै। मुदा अरबी-फारसी-उर्दूमे लोक जेहन अपन घरमे बाजैए ओकर शाइर ठीक ओहने वाक्यसँ शाइरी रचैत अछि तँए शेर-ओ-शाइरी सभहँक जीहपर चढ़ि जाइए मुदा मैथिलीक निज काव्य विधा जीहसँ खसि पड़ैत अछि मने लोक जल्दिए बिसरि जाइत छै। संस्कृतक एकटा प्रसिद्ध वाक्य थिक “गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति” । लोक एकर मतलब निकालै छथि जे कवि लेल गद्य लिखब आवश्यक कारण पद्यमे छंदक हिसाबसँ तोड़-ममोड़ तँ भऽ सकैए मुदा गद्यमे नै। मुदा ई सटीक नै। हमरा हिसाबें एकर गलत अर्थ लगाओल गेल छै। एकर अर्थ एना हेबाक चाही “पद्यमे जे कवि जतेक बेसी स्वाभिक रूपसँ गद्यक प्रयोग कऽ सकता सएह हुनक पद्य लेल निकष हेतनि” । हमरा बूझल अछि ई काज बहुत कठिनाह छै तँए एकरा मानए लेल कवि तैयार नै हेता। गद्यकार तँ अपनाकेँ एही बलें महान मानै छथि तँइ ओ तँ मानबे नै करता।

5) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहि देशमे विद्रोहक पहिल बीया गौतम बुद्ध खसएलनि। ओ बीया अंकुरित चाहे जहिया भेल हुअए, पल्लवित आ पुष्पित ओ तखनि भेल, जखनि सिद्ध-सन्तसभक समय आएल। विद्रोही तेवरहिक संग सिद्धलोकनिक प्राकृतमे लिखल साहित्य आधुनिकताक वाहक बनल आ एतहिसँ परम्परासभकंा चुनौती भेटए लागल.."

हमर कथन- हँ, परंपरा सभकेँ चुनौती भेटलै। मुदा धेआनसँ सोचियौ गौतम किएक सफल भेलाह विद्रोहमे। एकर मूल कारण छै जे गौतम सनातन धर्मक विशेषता ओ कमजोरी दूनूसँ परिचित भेलाह। ओइ विशेषताकेँ लऽ आ कमजोरीकेँ हटा अनुशासन संगे गौतम अपन नव पंथ चलेलाह जे कि लोकप्रिय भेल। सोचियौ जँ गौतम सनातन धर्मक विशेषता ओ कमजोरीसँ परिचित नै रहतथि तखन की होइतै? जँ ओ अपन नव विचार लेल अनुशासित नै रहितथि तखन कि ओ परिवर्तनक सफल नेतृत्व कऽ सकतथि? परिवर्तन वएह कऽ सकैए जे कि मूल नियमकेँ नीक जकाँ पालन केने होथि, ओकर ज्ञाता होथि मने अनुशासित होथि। एहन भैए ने सकैए जे नियमसँ अनजान लोक ओहि नियममे परिवर्तनक सफल संचालन केने होथि। गौतम बुद्ध बकायदा संघ केर संचालन लेल बहुत रास नियम बनेने रहथि। तखन तँ अरविन्दजीक हिसाबे गौतम बुद्ध सेहो संहिताक उपनिवेश बना देबाक लेल खराप भऽ गेलाह। बौद्ध धर्म अबिते साहित्य केर कथ्यमे परिवर्तन एलै। धेआनसँ पढ़ू कथ्यमे परिवर्तन भेलै। कर्मकांडक विरोध भेलै मुदा छंदेमे। छंदोमे परिवर्तन भेलै मुदा वार्णिक छंदक बदला मात्रिक छंद प्रचलित भेलै। मोन राखू संहिता ओहिना रहलै बस संहितामे नव-नव आकार-प्रकारक नियम सभ जुड़ि गेलै। दोहा-चौपाइ अही कालक देन छै। दोहे-चौपाइमे आन-आन पाँति जोड़ि घत्ता, कड़वक आदि छंद बनलै। आगू बढ़बासँ पहिने सरहपादजीक एकटा दोहा आ एकटा चौपाइ देखू (ई दोहा-चौपाइ हम हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावलीसँ लेने छी)-

जीवन्तह जो नउ जरइ, सो अजरामर होइ।
गुरु उवएसे विमल मइ, सो पर धरणा कोई ॥

एहि दोहामे देखू ठीक 13-11 केर नियमक पालन छै। आब चौपाइ देखू-

पंडिअ सबल सत्य बक्खाणइ। देहहि बुद्ध बसन्त ण जाणइ॥
गमणागमण न तेन विखण्डिअ। तो वि णिलज्ज भणहि हउ पण्डिअ॥

एहि चौपाइ केर चारू पादमे 16-16 मात्रा छै। अरविन्दजी कोन आधारपर बौद्ध धर्मक परिवर्तनकेँ छंदसँ जोड़ि देलखनि से हमरा पता नै। एहि ठाम दुइएटा उदाहरण देलहुँ अछि। पाठक आरो ताकि सकै छथि। बौद्ध धर्ममे अधिकांशतः कर्मकांडक मारल ओ अशिक्षित जन एलाह आ तकर बादो ओ अपन साहित्यमे छंदकेँ नै छोड़लाह। हुनकर आलोचना शक्ति गलत कर्मकांड लेल प्रयोग भेल छंद लेल नै। वस्तुतः छंदे हुनका सभहक साहित्यमे अतेक शक्ति देलक जे हुनकर बात सुगमतासँ जनता लग पहुँचए लागल। आब एखन जे शिक्षित जन छथि से छंद किए छोड़ए चाहै छथि से नै पता। छोड़बाक छनि तँ छोड़ि सकै छथि मुदा पाठक-जनतामे भ्रम पसारब कतेक उचित? छांदिक विधाक नामपर अछंद परसब कतेक उचित। ई सभ अपन रचनाक लेल दोसर नाम किएक नै ताकै छथि। व्यक्तिगत तौरपर हमरा बिना छंद बला रचनासँ दिक्कत नै अछि मुदा अछांदिक रचनाकार सभहक ई दायित्व छनि जे ओ कोनो विधाक नामपर अराजकता नै पसारथि। जँ कियो गजलमे बहरक-काफियाक पालन नै चाहै छथि तँ ओहि रचनाकेँ गजल नै कहथि। गजल जखने कहता तखने गजलक विधान ताकल जेतनि, ओहि आधारपर हुनकर कमजोरी उजागर कएल जेतनि। हमरा पूरा विश्वास अछि जे बौद्ध गण सभ अशिक्षित रहितो संस्कृतक छंद वा गजलक लेखन केने रहितथि तँ जरूरे ओकरो नियम पालन केने रहितथि। कारण ओ सभ अनुशासित छलाह, नियमक महत्वसँ परिचित छलाह तकर उदाहरण उपरमे हम देने छी।

6) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एकटा छोट-सन उदाहरण मुस्लिम स्त्रीक बुर्काक ली त एकर पारम्परिक रंग कारी होइत रहए। कालान्तरमे एकरा कलात्मक कढ़ाइसँ फैशनेबुल बनाएल गेलए आ आब ई उज्जर, कत्थी, भुइला आदि अनेक रंगमे उपलब्ध आ चलनमे छै। नहि आयल जे मुस्लिम सन कट्टर समुदाय पारम्परिकता आ आचार-संहिताक आधारपर एकरा बुर्का मानए सँ इनकार कएने हुअए.."

हमर कथन- एक बेर फेर अरविन्दजी परिवर्तनकेँ निशान मिटा देब बूझि लेने छथि। ओ बुर्कामे कढ़ाइ केर उदाहरण दऽ रहल छथि मुदा हम पुछबनि जे कढ़ाइ देलाक बाद बुर्का बुर्के रहलै वा कि बुर्काक बदला साड़ी भऽ गेलै। बुर्का रहबे केलै। तेनाहिते छंद रहबे करतै, बहर रहबे करतै। फेर कहब नियममे परिवर्तन नियमकेँ मानिए कऽ संभव छै। हम बहरे विदेह (22-22-22-22-1) मे गजल कहै छी। अरविन्दजीकेँ दिक्कत हेतनि तँ एहिमे परिवर्तन कऽ बहरे कोसी बन लेताह। ओहिमे दिक्कते की छै। दू टा उदाहरण दऽ रहल छी आ दूनूक पात्र जीबिते छथि। भारतीय शास्त्रीय संगीतमे विश्वमोहन भट्ट प्रख्यात नाम छथि। पं रविशंकरसँ सितार सिखने छथि बादमे भट्टजी सितार आ गिटार दूनूक संयोगसँ अलग वाद्य यंत्र बनेलाह जकर नाम भेलै "मोहनवीणा"। एहने एकटा कलाकार छथि निलाद्रि कुमार। ईहो सितारक महान वादक छथि। बादमे सितारक तारमे किछु परिवर्तन कऽ अलग बनेलाह जकर नाम भेलै "जितार"।

एहि उदाहरण सभसँ दू टा बात स्पष्ट अछि जे पहिल जे कोनो मूल चीजमे परिवर्तन करबा लेल ओहि मूल चीजक बारेमे पूरा जानब आवश्यक अछि। दोसर परिवर्तन भेलाक बाद नव चीजक नया नाम होइत छै। अरविन्दजी जँ बहरमे परिवर्तन चाहै छथि तँ हुनका पहिने बहरक पालन करए पड़तनि। अइ बिनु परिवर्तन सफल नै हेतनि। जँ बहरक पालन नै चाहै छथि तँ ओकरो स्वागत मुदा तखन अपन विधा लेल नव नाम ताकथु। अन्यथा गजल लेल जे अनिवार्य तत्व सभ छै से हुनकर रचनामे ताकल जेबे करत आ नै भेटलापर खारिज हेबे करत। आ इएह बात ओहन सभपर लागू होइए जे कि अपन कमजोरी नुकेबाक लेल किछुओ लीखि ओकरा गजल कहि देबाक अभियान चला लेने छथि।

7) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "उल्लेख करैत चली जे हमरा सभक प्राचीनतम काव्य वेदसभमे सुरक्षित अछि, फेर रामायण आ महाभारतमे। एहिना 'नाट्यशास्त्र हि काव्य शास्त्रक प्राचीनतम ग्रंथ अछि जकर समय ईसा पूर्व छठम् शतीसँ लए कए ईसाक दोसर शती तक मानल गेल अछि आ भरत मुनि काव्य-शास्त्रक आदि चिंतक। एहि प्राचीनतम काव्य आ प्राचीनतम काव्य शास्त्रक बीच अनेक शतीक अन्तर अछि। भरत मुनिसँ लए कए पंडितराज जगन्नाथ तक लगभग डेढ़ हजार वर्ष तक पसरल संस्कृत काव्यशास्त्रक परम्परामे अनेक काव्य सिद्धान्तक प्रतिपादन आ खण्डन-मण्डन होइत रहल अछि.."

हमर कथन- डेढ़ हजार वर्ष हो कि डेढ़ लाख वर्ष मुदा जे भेल से संहितेक भीतर भेल। नियमक भीतर भेल, छंदक भीतर भेल। हँ एतेक तँ हम जरूर मानब जे गायत्री कि अनुष्टुप छंदमे व्यक्त भेल कर्मकांडक खंडन दोहा-चौपाइ वा कि आन कोनो छंदमे भेल। मुदा जे भेल से छंदेसँ भेल।

8 ) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "ई अलग बात जे अरबीमे गजल नहि भेटैत अछि.."

हमर कथन- ई बात ओहिना भेल जेना कियो कहथि जे भारतमे बौद्ध धर्म जन्मल मुदा बौद्धसँ संबंधित चीज भारतमे नै लिखाएल। अरबीमे गजलक परंपराक एक झलक अरविन्दजी एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि https://www.dawn.com/

9) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "प्रत्येक युग लीक छोड़िकए चलनिहार सिंह आ सपूतके जन्म देलक अछि त लीक छोड़ि चलनिहार शाइरके सेहो.."

हमर कथन- ई बात सही छै जे हरेक कालखंडमे लीक छोड़ि चएल बला सभ हरेक क्षेत्रमे भेलाह अछि। मुदा लीक छोड़ि चलब की छै? की बिनु पएरकेँ लीक छोड़ि चलल जा सकैए? हमरा जनैत अरविन्देजी नै हरेक मैथिल बिनु पएरकेँ चलब लीक छोड़ि चलब मानि लेने छथि। चलब क्रियामे पएर महत्वपूर्ण छै से चाहे पुरने लीकपर हो कि नव लीकपर। एकटा फेर उदाहरण दै छी जकर पात्र एखनो जीबैत छथि।

होली उल्लासक पाबनि छै आ तकर गीतमे उल्लासे भाव रहैत छै। होली गीतक प्रमुख पात्र क्रमशः कृष्ण, राम, शिव ओ अन्य छथि। ताहूमे शिव पात्र बला गीत दू खंडमे छै पहिल तँ जेना राम वा कृष्णक छनि। आ दोसर श्मसान बला। आन गीत सभ तँ समाजमे प्रचलित छै मुदा श्मसान बला होली गीत समाजमे प्रचलित एखनो बेसी नै छै। भारतीय शास्त्रीय संगीतमे छन्नू लाल मिश्र नामक गायक छथि जे कि शिवक श्मसान बला होली गीत समाजमे प्रचलित केलाह। गीतक बोल छै "खेले मसाने मे होली दिगंबर.."। एहन नै छै जे ई होली गीतक छन्नु लाल जी देलाह। ई गीत तँ बहुत पहिनेसँ छै मुदा एहि गीतक संग जे धारणा छै से छन्नु लालजी तोड़लाह। मुदा एहि धारणाकेँ तोड़बाक लेल छन्नुजी होली गीतकेँ सोहर, कि चौमासा कि कजरी रागमे नै गेलखिन। होलीक जे राग छै ताही रागमे ओ गेलखिन। लीक तोड़ब इएह भेलै। जँ छन्नू लालजी होलीकेँ सोहर रागमे गेने रहितथि तँ भारतक संगीत समाज हुनका माथसँ पटकि देने रहितनि। साहित्यकार लीक तोड़थि मुदा अपन पएर काटि कऽ नै से जानब आवश्यक। एहिठाम हम अपन नोट- लगाएब जे मैथिली साहित्ये नै, गीत-संगीत, परंपरा, बिजनेस आदि कोनो काजमे आगू नै छथि तकर एक मात्र कारण इएह अछि जे ओ सभ अपन पएर काटबकेँ लीक तोड़ब बुझि लेने छथि।

10) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "1700 ई. अर्थात् आइसँ तीन शताब्दी पहिने वली दक्खिनी (दकनी), जिनका ‘पैगम्बर-ए-सुखन' अर्थात् शाइरीक पैगम्बर कहल गेल छै, शब्दके अपन तरीकासँ लिखबाक छूट लेलनि। ओ 'तुमको' के 'तुमन', 'हमको' के 'हमन', 'से' के '', 'से', 'सेती' आ 'को' के 'कूँ' लिखलनि। ई ‘हमन'बला प्रयोग कबीर लग सेहो भेटै छै- हमन है इश्क मस्ताना.."

हमर कथन- भाषायी छूट तँ मैथिलीमे बहुत बेसी छै। केयो बदला कियो, कएल, कयल,कैल.... जतेक छूट लेताह अरविन्दजी से लेथि। एहिमे कोन मनाही छै। मूल बात ई छै जे जेहन शब्द हेतै तकर मात्रा ओनाहिते गनेतै। हमन=12, हमारा=122, हम=2 तेनाहिते केयो=22, कियो=12, एम्हर-22, कएल=121, कयल=12,कैल=21 कतेक रूपक प्रयोग करताह अरविन्दजी। दोसर बात छूटो ओकरे भेटै छै जे अनुशासित होइत छै। अरविन्द जी कबीरक पाँति देलाह अछि "हमन है इश्क मस्ताना.."। ई वस्तुतः गजल छै आ से पूरा बहरमे छै। दू टा शेर दऽ रहल छी-

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या?

जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दरबदर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या?

ई गजल बहर—ए—हजज जाहिमे 1222-1222-1222-1222 केर मात्राक्रम अछि तकर पूरा पालन भेल अछि। उदाहरणसँ स्पष्ट अछि जे छूटो हुनको भेटि सकैए जे अनुशासित छथि। कबीर अनुशासित छलाह तँइ हुनकर भाषायी प्रयोग स्वीकारल गेलनि। मैथिलीमे बहुते भाषायी छूट छै तँइ छंद-बहरक पालन बहुत आसान छै। अरविन्दजी जानथि कि नै जानथि मुदा पाठक एक बात अवश्य जानि लेथि जे प्राचीन क्रांतिकारी कवि जेना पादगण, रैदास, कबीर ओ अन्य सभ छंदक पालन केने छथि। ओ सभ विद्रोह केने छथि, परिवर्तन केने छथि मुदा समाजमे भ्रम पसारि कऽ नै। आ एहि आलेखमे हम उदाहरण स्वरूप हुनकर लिखल सभ सेहो देने छी।

11) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "कोनो गजलक मतलाक शेरक दुनू मिसरामे समान रदीफक प्रयोगक आग्रह रहल अछि। किन्तु उर्दूएक अनेक शाइर एकरा अनेक ठाम अनठिअएने छथि। आ तेकर उदाहरण गालिबसँ लए कए अली सरदार जाफरी आदि तक देखल जाए सकैत अछि। आ ई रदीफ की छै? गालिबक संग्रह (प्रस्तुति : राजपाल एण्ड सन्स, दिल्ली)मे गजलसँ पहिने शीर्षक रूपमे ओकर रदीफ एना लिखल गेल छै– रदीफ अलिफ (अ), रदीफ ते (त), रदीफ जीम (ज), रदीफ दाल (द), रदीफ रे (र), रदीफ सीन (स), रदीफ काफ (क), रदीफ मीम (म), रदीफ नून (न), रदीफ गाफ (ग), रदीफ वाओ (व, ओ), रदीफ ये (ए, इ, ई) आदि। एहन स्थितिमे उर्दूसँ दीगर भाषाबला लोक की करत.."

हमर कथन- अरविन्दजी पता नै कोन पोथी पढ़ि एहि बातकेँ गजलसँ जोड़ि देलखिन। हम जतेक जनैत छी ताहि अनुसारे ई गजलक नियम छैहे नै। अरविन्दजी जतेक बात लिखने छथि ताहिसँ बुझाइए जे ओ दीवानक परिभाषा नै बुझि सकल छथि। दीवान कोनो शाइरक एहन गजल संग्रहकेँ कहल जाइत छै जाहिमे गजलक प्रस्तुति ओकर रदीफक अंतिम वर्णानुसार हो। आब उर्दूमे वर्ण कोना होइत छै से बूझल हेतनि अरविन्दजीकेँ से उम्मेद अछि हमरा। मने दीवान गजलक प्रस्तुतिकरण शब्दकोशक नियमसँ चलैत छै। मज्मूआ एहन संग्रहकेँ कहल जाइत छै जाहिमे वर्णानुसार प्रस्तुति नै होइत छै। कोनो शाइर केर रचनाक समग्र प्रस्तुतिकेँ कुल्लियात कहल जाइत छै। आब पोथीमे रचनाक प्रस्तुतिकरणकेँ गजलक बहरसँ कोन आ कतेक संबंध छै से हमरा नै पता।

12) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "एहिना एकटा आग्रह छै तकाबल- रदीफैन। एकर अनुसार मतलाक बाद बला शेरक पहिल मिसरामे रदीफ नहि अएबाक चाही। रदीफ लमगर है त ओकर अन्तिमहु शब्द नहि अएबाक चाही। किए? उस्ताद एकर उत्तरमे कहताह जे फारसी अरुजक इएह परम्परा छै। चूल्हिमे जाओ परम्परा! अँ कथ्यक सौन्दर्यक लेल दुनू मिसरामे रदीफक अन्तिम शब्द आबि गेलए, रदीफ आबि गेलए त कोन अन्हेर भए गेले.."

हमर कथन- हरेक काव्यशास्त्रमे एहन बहुत रास दोषक विवरण होइत छै जकरा हटेलासँ काव्य उत्तम होइत छै। भारतीय काव्य परंपरामे सेहो बहुत रास काव्य दोष छै जेना- शब्द दोष, च्युत संस्कृति दोष, अश्लीलत्व दोष, क्लिष्टत्व दोष आदि सभ छै। एहि दोष सभहक अतबे मतलब भेलै जे काव्यमे जँ ई दोष नै रहितै तँ ई उत्तम काव्य होइतै। जँ कोनो काव्यमे अनिवार्य नियम यथा छंदक आदिक पालन तँ भेल छै मुदा आन कोनो दोष छै तैयो दोषक संग ओ काव्य तँ छैहे कारण ओकर अनिवार्य नियम यथा छंदक आदिक पालन तँ भेले छै। तेनाहिते शाइरीक परंपरामे सेहो बहुत रास ऐब (दोष) केर उल्लेख छै जाहिमे एकटा ऐब छै- तकाबल-ए-रदीफैन। एहि दोषक ई परिभाषा भेलै- जँ मतलाक बाद कोनो आन शेरक पहिल पाँतिक अंतमे बिना काफियाक रदीफ देल जाए तँ ओ दोष भेलै। ठीके ई दोष भेलै। मुदा एकर अपवादो सभ छै मुदा अपवाद नियम नै होइत छै। अपवादकेँ अपवादे मानब उचित। अरविन्दजी अपवादकेँ नियम मानि लेने छथि से हमरा बुझाइए। फेर मोन राखू- काव्य दोषक मतलब छै जे काव्यमे अनिवार्य नियमक पालन भेलाक बादक दोष। एहि दोष लेल अनिवार्य नियमकेँ बेकार मानब कतेक उचित से पाठक वर्ग जानथि।

13) अरविन्दजी लीखै छथि जे- 'कोई हो मौसम थम नहीं सकता रक्से-जुनूँ दीवानो का जंजीरों की झनकारों में शोरे-बहाराँ बाकी है।' अली सरदार जाफरीक एहि गजलक उपरोक्त मतलाक शेरमे दुनू मिसराक अन्तमे रदीफक अनिवार्यता नहि मानल गेल छै..’

हमर कथन-अरविन्दजी अली सरदार जाफरीजीक जाहि पाँतिक उल्लेख केने छथि से जाफरीजीक पोथी "मेरा सफर"सँ लेल गेल अछि जे कि भारतीय ज्ञानपीठसँ प्रकाशित भेल अछि। ई पोथी जाफरीजीक नज्म सभहक संग्रह अछि। ओना नज्मक पोथीमे सेहो गजलक संकलन भऽ सकैए वा कि गजलक संग्रहमे नज्म सेहो भऽ सकैए। कोनो गजलमे मतला नै छै (बहुत एहन उदाहरण भेटत) जकर एकमात्र कारण छै जे बहुत बेर एहन होइ छै जे शेर सभ लिखाएल मुदा ओकर मतले सटीक नै आबै छै तखन या तँ रचनाकार अपने ओकरा संकलन कऽ दै छै वा कि ओकर संपादक ऐतिहासिकताक दृष्टिकोणसँ दै छै। लगभग 100 बर्ख पहिले धरि गजल आ नज्मक शिलपमे ओतबे अंतर रहै जतेक अंतर तसलाक भात एवं प्रेसर कुकर (आब राइस कुजिन सेहो) केर भातमे छै। एकटा नज्मक उदाहरण दै छी जे कि छै तँ नज्म मुदा अरविन्दजी ओकरा गजल मानि लेताह। ई नज्म मजाज केर छनि-

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ

ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

अरविन्दजी एकरा गजल मानि लेताह कारण एहिमे काफिया-रदीफक पालन भेल छै। तँ की ई गजल भऽ जेतै? मैथिलीक लेखक सभकेँ शाइरी परंपराक अध्य्यन करबाक चाही। शाइरी माने मात्र गजले टा नै होइ छै। हमरा लगैए जे अरविन्दजी गजल आ नज्मकेँ एकै बूझि लेने छथि।

14) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "गजलक अन्तिम शेर, जेकरा मकता कहल जाइ छै, ताहि शेरमे गजलकार अपन नाम, उपनाम अथवा तखाल्लुस आनै छै। अँ एकर प्रयोग नहि हुअए किंवा मकताक शेरमे प्रयोग नहि कए मतलाक शेरमे वा बीच बला कोनो शेरमे प्रयोग कएल जाइ त एहिसँ गजलकें कोन क्षति होइ छै, जैं फॉर्मेटक बदला कथ्यके महत्व दी त एहिसँ कोनोटा क्षति नहि, रत्तीअहु भरि नहि.."

हमर कथन- लगैए अरविन्दजी गजलक प्रकृतिसँ ओतेक परिचय प्राप्त नै कऽ सकल छथि। गजलक हरेक शेर स्वतंत्र रूपमे होइत छै तँइ दोसर शेरकेँ तेसर स्थानपर दऽ दियौ वा कि चारिम कि पाँचम स्थानपर ओहिसँ किछु नै बिगड़तै। हँ, मतलाकेँ अपन पहिले स्थानपर हेबाक चाही अनिवार्य रूपसँ। शेरमे शाइर अपन नाम-उपनामक प्रयोग नहिए करता तँ गजलकेँ की बिगड़ै छै? आब ओनाहुतो नाम उपनामक प्रयोग नै के बराबर छै। जँ शाइर चाहथि तँ अपन नाम-उपनाम बला शेर गजलमे कत्तौ राखि सकै छथि मुदा तकरा "मकता" नहि कहि सकै छथि। नाम-उपनामसँ सजल शेर मकता तखने कहा सकैए जखन कि ओ सभसँ अंतमे आबै। एकटा प्रश्न अरविन्दजी जखन शेरक स्थान लऽ कऽ कोनो दिक्कत नै छै तखन आन स्थानपर नाम बला शेरकेँ मकता कहबाक जिद किए धेने छथि।

15) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "छन्दक उपयोग गेयता लेल, गेयताक उपयोग लोकप्रियता लेल होइ छै आ लोकप्रियताक लालच शाइरके वायवीय संसारमे लए जाइत छै, यथार्थसँ दूर करै छै.."

हमर कथन- अरविन्दजीकेँ छन्दक प्रकृति नै बूझल छनि। छंद गेयता लेल नै होइत छै। असंख्य एहन रचना छै जे कि बिना छंदक छै आ ओकर गायन लोकप्रिय छै। ई अलग बात जे छंद बला रचनाकेँ सेहो गाएल जाइत रहलैए मुदा ई अपराध तँ नै छै। छंद एकटा बाटक नाम छै। जँ अहाँकेँ ओहि बाटपर नै चलबाक अछि तँ ई अहाँक मर्जी मुदा छंदक बाटसँ जे लक्ष्य भेटै छै सएह लक्ष्य ओहि बाटकेँ छोड़ि अहाँ क्लेम करबै से मान्य नहि हएत। बिना दोहाक नियम पालन केने अहाँ कोनो दू पाँतिकेँ दोहा कहि देबै से कियो नै मानत। बिना बहरक रचनाकेँ गजल कहि देबै कियो नै मानत। जँ छंदक बाट नै चाही तँ अहाँ अपन रचनाकेँ अलग नाम दियौ। इएह उचित तरीका छै।


16) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "साहित्यकारसँ अपेक्षित अछि जे ओ लोकक रुचि बदलए आ वएह बात कहए जे सत्य छै, भनहि अप्रिय हुअए आ लोककें तत्काल नीक नहिअहु लागए.."

हमर कथन- लोकक रुचि बदलबाक काज छंदक नै, रचनाक कथ्यक नै बल्कि लेखक केर आचरणपर निर्भर करै छै। जाहि लेखक केर आचरण नीक रहतै ओहि लेखक केर बिना छंदो बला रचना लोकक रुचि बदलि देतै। जाहि लेखक केर आचरण भ्रष्ट छै से कतबो छंद राखत ओ रुचि नै बदलि सकैए। प्रधानमंत्री आवास योजनामे घूस खाए बला लेखक कि अपन कनियाँ छोड़ि आन ठाम मूँह मारए बला लेखक सभहक नकली गर्जन चमचा सभ सूनै छै समाज नै। अरविन्दजीक लेखन-आचरण एकसमान छनि। जँ ओ बिना भ्रम पसारने अछंदोमे लिखता प्रभावी हेतै मुदा शर्त अतबे जे भ्रम केर संग छोड़ए पड़तनि। समाजमे बिना भ्रम पसारने अपन बात राखब बेसी काज करतै।

17) अरविन्दजी लीखै छथि जे- "अली सरदार जाफरी सन जिदिआह शाइर सेहो भेला जे अवाजक जोर-आजमाईशक बीच बिनु ऊँचगर आवाज आ बिनु आलाप लेने अपन रचना-पाठकें लोकप्रिय बनाए लेलनि, आ रचना केहन त आजाद आ रदीफ-काफिया रहित। सरदार जाफरी दिआ सिद्धिकुर्रहमान लिखै छथि- ...आजाद आ रदीफ-काफिया रहित नज्मकें जै स्वीकार कए लेल गेल.."

हमर कथन- उपरमे हम संकेत देने छलहुँ जे अरविन्दजी गजल आ नज्मकेँ एकै बूझि लेने छथि। से एहि ठाम स्पष्ट भऽ गेल। एक बेर फेर हम कहब जे नज्मक शिल्पकेँ गजलक शिल्पसँ कोन लेना-देना छै। दूनू अलग-अलग विधा छै। हम तँ अतबे कहि सकै छी जे शाइरीमे मात्र गजले नै बहुत रास विधा छै। परिचय प्राप्त करबाक भार अरविन्दजीक उपर छनि।

18) अरविन्दजी लीखै छथि जे-"वाचिक परम्पराहिक परिणाम रहए जे कविता ‘सुनाएल' जाइत रहए, गजल 'कहल' जाइत रहए। स्वाभाविक रहय जे एहि 'सुनाबए' आ 'कहए' के प्रक्रियामे गेयता एकटा प्रमुख कारक भए गेलए.."

हमर कथन- हम अरविन्दजीकेँ मोन पाड़ए चाहबनि जे वाचिक परंपरामे कविते आ गजल नै कथो कहल आ सुनाएल जाइत छलै। आ कथे किए वाचिक (मूल परंपरा) रूपे साहित्य केर सभ विधा कहले आ सुनाएल जाइत छलै। मुदा ताहिमे गेयता रहितो छलै आ नहियो रहैत छलै। लिखित परंपरा बहुत बादमे बहुत कम मात्रामे भेलै। बादमे जा कऽ पूरा-पूरी लिखित परंपरा एलै जे कि एखन धरि छै। मुदा ताहूमे आब परिवर्तन भऽ रहल छै।

ई सभ तँ छल अरविन्दजीक भूमिकाक संदर्भमे हमर कथन। एहि भूमिकामे बहुत रास बात एहनो अछि जकरा गजल विधासँ नजदीकी संबंध नै छै। हम एहन प्रसंगकेँ छोड़ि देल अछि। आब एहिसँ आगू बढ़ि एहि पोथीक रचनाक कथ्यपर सेहो बात कऽ ली से नीक रहत।

ई बात हम बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे मैथिलीमे लगभग सभ रचाकारक कथ्य ठीक रहैत छनि तँइ अरविन्दजीक रचनाक कथ्य सेहो ठीक छनि मुदा एकटा अंतर हमरा देखाइए जे जतेक खुलल वा नीक विषय ई अपन कवितामे निर्वाह करैत छथि ततेक एहि कथित गजल सभमे नै अछि। ई बात तखन छै जखन कि एहि रचना सभमे छंदक निर्वाह नै भेल छै। जँ छंद रहितै तखन कहल जा सकैत छलै जे छंदक कारणे कथ्य बाधित भेलै मुदा बिना छंदक रचना रहितो अरविन्दजी अपन कविता बला तेवर एहिमे नै आनि सकलाह। जे पाठक अरविन्दजी नव कविता संग्रह "सबद मितारथ ध्याया" एवं ई कथित गजलक संग्रह पढ़ने हेता से हमर अइ कथनकेँ जाँचि सकै छथि। ओना अपवाद हरेक नियमक छै तँइ एहि संग्रहमे किछु एहनो पाँति सभ अछि जे नव छै जकरा नीक कविता वा पद्य मानल जा सकैए। एहन पाँति सभकेँ हम निच्चा लिखैत जा रहल छी—

अहाँ इशारा करैत गेलौं, हम
शत योजन धरि बुलिते गेलिऐ
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

नर छै, मादा छै,हिजड़ा छै ई सत्ता, की छिअय
किन्नहुँ नञि बुझि पएबह, लाख गत्तर देखि लएह
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

कतेक बाधा टपि ई लत्ती चार पर पहुँचल हेतय
जेकर धन जिजीविषा, तेकरेसँ ई बुझल हेतय
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX

छिटने छथि जे वीर्य अपन देहक बजारमे
अक्षतयोनि कनियाँ संग कोहबर चाहय छथि

एहि नीक पाँतिक संगे किछु एहनो पाँति सभ अछि जाहि ठाम हमर अनुभव नै पहुँचि सकल अछि। एहन पाँति सभ अछि—

लड्डू जकाँ भिड़ल भैयारी
गाम लुटय छै बुनियाँ रामा

एहि दू पाँतिमे हमरा बिंबे उल्टा लागल। लड्डू तँ एकताक बिंब हेबाक चाही। कारण लड्डूक सभ घटक एकठाम रहैत छै। अही पोथीक दोसर रचनाक पाँति देखू जाहिमे बिंब ठीक अछि -

सभ अंगुरी भए सघन सकत मुक्का भए जाइ छै
एका तजि सक्कत पाथर गरदा भए जाइ छै

हम पहिने कहने छी जे ई हमर अनुभवजन्य बाध्यता सेहो भऽ सकैए मुदा हम जे इशारा केलहुँ तकरा पाठक नीक जकाँ देखताह से हमरा विश्वास अछि। एहि उदाहरण सभक अतिरिक्त एहि पोथीक भाषोपर बात हेबाक चाही। जँ हम दरभंगा-मधुबनीक आँखिसँ पोथीक भाषाकेँ देखबै तँ एहि पोथीमे सुधारक जरूरति बुझाएत मुदा हमरा सभकेँ एहि पोथीक भाषाकेँ सरहसा-सुपौलक हिसाबसँ देखए पड़त तखने सही तथ्य एतै आ दुर्भाग्यसँ हम ओहि कातक भाषासँ ओतेक परिचित नै छी। मुदा अरविन्दजीसँ हमरा जतेक बात होइए तकर ध्वनि आधारपर हम कहि सकैत छी जे एहि पोथीमे ओहि क्षेत्रक स्थानीय पुट लेने अछि ई पोथी आ से मैथिली लेल शुभ अछि। हमर सभहक (समग्र विदेह पत्रिका) आग्रह हरेक लेखकसँ पहिनेहो रहैत छल आ एखनो अछि जे लेखक अपन परिवेशक भाषामे लीखथि। आ निश्चित तौरपर अरविन्दजी अपन परिवेशक भाषामे लिखने छथि तँइ हुनका द्वारा उठाएल भाषायी छूट (देखू प्वांइट-10) केर कोनो विशेष अर्थ नै लगैए।

स पूर्व्यो महोनां वेनः क्रतुभिरानजे। यस्य द्वारा मनुः पिता देवेषु धिय आनजे।।

(सामवेदक ई मंत्र अछि जकर मूल अर्थ अछि जे याज्ञिक आदिक सहयोगसँ हविष्यान्नक सेवन करबाक लेल सभ देवताक राजा इंद्र यज्ञ स्थलपर अबैत छथि। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे मैथिली पाठक एहि आलोचनाक आनंद प्राप्त करबाक लेल एहिठाम आएल हेताह)
नोट- संस्कृत साहित्यमे हमर गति बेसी नै अछि। हम जतेक जे उदाहरण एवं अर्थ देलहुँ से पोथी सभसँ लेने छी। हँ, ओकर उपयोग कोन ठाम हो से विचार हमर अछि।

लेखक: आशीष अनचिन्हार

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कर्ममे एना रमा जाउ संगी स्वर्गमे सिड़ही लगा जाउ संगी भेटलै ककरा कथी मेहनत बिनु बाट गन्तव्यक बना जाउ संगी नै घृणा ककरोसँ नै द्वेष राखू नेह चारु दिस बहा जाउ संगी चित्तमे सुनगत अनेरो जँ चिन्ता धूँइयामे सब उड़ा जाउ संगी ठेस लागल ओकरे जे चलल नित डेग उत्साहसँ बढा जाउ संगी किछु करु हो जैसँ कल्याण लोकक नाम दुनियामे कमा जाउ संगी ओझरी छोड़ाक जिनगीक आबो संग कुन्दनके बिता जाउ संगी फाइलुन–मुस्तफइलुन–फाइलातुन © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल

एखन हारल नै छी खेल जितनाइ बांकी छै इतिहासक पन्नामे नाम लिखनाइ बांकी छै गन्तव्यक पथ पर उठलै पहिल डेग सम्हारल अन्तिम फल धरि रथ जिनगीक घिचनाइ बांकी छै विद्वानक अखड़ाहामे करैत प्रतिस्पर्धा बनि लोकप्रिय लोकक बीच टिकनाइ बांकी छै लागल हेतै कर्मक बाट पर ठेस नै ककरा संघर्षक यात्रामे नोर पिबनाइ बांकी छै माए मिथिला नै रहितै तँ के जानितै सगरो ऋण माएके सेवा करि कऽ तिरनाइ बांकी छै सब इच्छा आकांक्षा एक दिन छोडिकेँ कुन्दन अन्तर मोनक परमात्मासँ मिलनाइ बांकी छै 2222-2221-221-222 © कुन्दन कुमार कर्ण

गजल: जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या

जदी छौ मोन भेटबाक डेग उठा चलि या हियामे चोट आ बदनमे आगि लगा चलि या छियै हम ठाढ़ एहि पार सात समुन्दरकें हियामे प्रेम छौ त आइ पानि सुखा चलि या जरै हमरासँ लोकवेद हार हमर देखि भने हमरा हराक सभकें‌ फेर जरा चलि या बरेरी पर भऽ ठाड़ हम अजान करब प्रेमक समाजक डर जँ तोरा छौ त सभसँ नुका चलि या जमाना बूझि गेल छै बताह छियै हमहीं समझ देखा कनी अपन सिनेह बचा चलि या 1222-1212-12112-22 © कुन्दन कुमार कर्ण

रक्षा बन्धन गजल

प्रेम दिवस विशेष पोष्ट कार्ड

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