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विशेष

कविता : पराती

रंग विरंगक भास छलै गीत गबैत परात रहै भोर कहै शुभभोर सदा बड्ड मजा छल बड्ड मजा आब दलानक शान कहाँ बूढ़ पुरानक गान‌ वला इन्टरनेटक शासनमे संस्कृति खातिर सोचत के छन्द : सारवती (ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ) Kundan Kumar Karna

गजल : देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै

देखू लाठीयेक सब ठां शोर भेल छै
लोकतन्त्रेमे कलम कमजोर भेल छै

ककरा पर करतै भरोसा आमलोक सब
कुर्सी पबिते सैह देखू चोर भेल छै

बस्ती बस्ती छै चलल परिवर्तनक लहरि
आइ शोणित लोककें इन्होर भेल छै

एक टा सब्जी कते दिन खाइते रहत
नव सुआदक लेल लोकक जोर भेल छै

चान‌ दिस ताकै गगनमे आब के कहू
दूरभाषे यन्त्र मनुषक खोर भेल छै

ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽऽ - ऽ।ऽ - ।ऽ

© कुन्दन कुमार कर्ण

Kundan Kumar Karna


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