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फ़रवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विशेष

शुरू भेल 'मैथिली गजल पाठशाला'

मैथिली गजल प्रबर्धनके लेल 28 डिसेम्बर 2025 सँ 'मैथिली गजल पाठशाला' शुरू कएल गेल अछि । वाट्स ऐपपर शुरू भेल एहि पाठशालासँ मैथिली गजलमे नव गजलकार सभक प्रवेश हेतै से विश्वास लेल गेल अछि । पाठशालामे अभ्यर्थी सभक संख्या उत्साहजनक रूपमे निरन्तर बढि रहल छै । एखन धरि ६० सँ बेसी अभ्यर्थी सब सकृयतापूर्वक अभ्यास कऽ रहल छथि । पाठशालामे सहजकर्ताक रूपमे प्रशिक्षण कार्यमे आशीष अनचिनहार, कुन्दन कुमार कर्ण आ अभिलाष ठाकुर उल्लेखनीय काज कऽ रहल छथि । गजलमे नव आगन्तु सभक लेल मैथिली गजल नि:शुल्क सिखबाक सुअवसर अछि ई पाठशाला । पाठशालामे प्रत्येक दिन क्रमबद्ध तरिकासँ अभ्यास भऽ रहल छै आ अभ्यर्थी सभके प्रशिक्षक सभद्वारा प्रभावकारी पृष्ठपोषण प्रदान कएल जा रहल छै । जँ मैथिली गजल सिखबामे अहूँके रुची अछि त निच्चा देल QR स्कैन करि वा लिंकपर जा कऽ पाठशालामे सहभागी भऽ सकै छी । QR लिंक एहिपर क्लीक करि 'मैथिली गजल पाठशाला'सँ जुटू

गीतः अंगनामे कुचरल कौआ

अंगनामे कुचरल कौआ कि जागि उठल बौआ हवासँ आयल कोनो सनेश यौ पियाकें यादमे भेलौं हम विभोर रहि–रहि नैनसँ टपकै नोर बीत गेल होरी दीवाली मोन रहैए सदिखन खाली एक छन सौ साल लगैए सुखि रहल अछि ठोरक लाली किए छोडि चलि गेलौं परदेश यौ कहिया आएत खुशीक भोर रहि–रहि नैनसँ टपकै नोर लोक सब ताना मारैए रंग विरंगी बात काटैए असगर हम की–की सहबै अपने घर विरान लागैए आबो घूरि आउ अपन देश यौ हमरो हृदयमे मचतै शोर रहि–रहि नैनसँ टपकै नोर अंगनामे कुचरल कौआ........... © कुन्दन कुमार कर्ण मैथिली गीत / Maithili Song

गीत: इजोरियामे उगल छै चान जहिना

इजोरियामे उगल छै चान जहिना अहाँकें चेहरा पर चमकै मुस्कान तहिना निखरल चेहरा तै पर गदरल जवानी देखि बदरी बरसै अमृत सन पानी चारु दिशामे अहींकें बखान ये साउनमे हरिअर छै धान जहिना अहाँकें चेहरा पर.......... सिनेहक नजरिसँ हमरा दिस तकलौं छन भरिमे हमर हृदयमे बसलौं दुनियाँ भऽ गेलै बहुते हरान ये पान संग सोहाइत छै मखान जहिना अहाँकें चेहरा पर.......... © कुन्दन कुमार कर्ण मैथिली गीत / Maithili Song

मैथिली गजलक अकाश पर अर्धज्ञानक बदरी

अनुशासन+विद्रोह=परिवर्तन अनुशासनहीनता+विद्रोह=अराजकता अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिरः । सं देवत्रा बभूवथुः (ॠगवेदक ई मंत्र अछि जाहिमे अग्नि ओ सोमदेवक निमंत्रण देल गेल छनि आ कहल गेल छनि जे अहाँ दूनू ऐश्वर्यसँ भरल छी, अहाँ दूनू देवत्वसँ युक्त छी। अहाँ दूनू गोटे संयुक्त रूपे एहिठाम आमंत्रित छी। अहाँ दूनू गोटे हमर स्तुति स्वीकार करी। अही मंत्रक अनुकरण करैत हम कहि सकैत छी जे हमर हरेक आलोचना लेल लेखक ओ पाठक दूनू सादर आमंत्रित छथि। दूनूक यथायोग्य सत्कार कऽ हम अपनाकेँ भाग्यवान बूझब)। मैथिली साहित्यमे एकटा परंपरा छै जे कोनो गलतीकेँ वेद वाक्य मानि लगभग पूरा लोक ओही गलतीकेँ पकड़ि जीवन भरि चलताह आ मैथिली साहित्यकेँ गलत परंपराक इनारमे खसबैत रहताह। खास कऽ मैथिली गजलक संदर्भमे तँ ई बात आरो देखल जाइए। अही क्रममे हम अरविन्द ठाकुरजीक पोथी "मीन तुलसीपात पर" केर चर्च करब। एहि पोथीमे गजलक व्याकरण आदिक बारेमे एहन प्रश्न सभ उठाएल गेल छै जकर कोनो विशेष माने नै लागै छै। गजलक व्याकरण नहि हो ताहि लेल एहनो बात कहल गेल छै जकर गजल विधासँ कोनो लेना-देना नै छै। आब अरविन्दजीक एहि पोथीक भूमिकाकेँ किछु युवा ...